अनेकात्म रहस्य

अक्सर लोग पूछते हैं कि सनातन ग्रंथों के अनुसार भगवती से विष्णु और विष्णु से भगवती उत्पन्न हुई हैं। ऐसे ही शिव से ये दोनों और इन दोनों से शिव हुए हैं। आदि आदि फिर इनमें श्रेष्ठ कौन।

वास्तव में ये लौकिक सूर्य और परब्रह्म सूर्य में भेद है। ये लौकिक सूर्य परब्रह्म सूर्य के अंश हैं। जैसे विष्णु भूमापुरुष के, शंकर जी सदाशिव के, गणेश जी महागणपति के और दुर्गा जी पराम्बा राज राजेश्वरी के अंश हैं।

मैं अभी एक लड़के को पढ़ा रहा था तो मैं एक शिक्षक था। अब जब मैं पढ़ाना बंद करके बाज़ार गया तो मुझ शिक्षक ने एक ग्राहक को उत्पन्न किया। मैं वापस घर आ कर फिर पढ़ाने लग गया और इस बार मुझ ग्राहक ने एक शिक्षक को उत्पन्न किया। तत्वतः मुझ शिक्षक और मुझ ग्राहक में कोई भेद नहीं। लेकिन कार्यतः भेद है। और जब मुझे जानने वालों ने कहा कि शिक्षक ने ग्राहक को उत्पन्न किया तो दूसरे लोगों को बात समझ न आई। और जब उन्होंने कहा कि ग्राहक ने एक शिक्षक को उत्पन्न किया तो पूर्वपक्ष भ्रमित हो गया। हद तो तब हो गयी जब मेरे मित्र ने मुझसे कुछ रुपये मांगे और शिक्षक और ग्राहक ने एक दाता को जन्म दिया। और फिर इस तरह से एक पक्ष और उत्पन्न हो गया। अलग अलग समय पर ब्रह्म का वह रूप जो विष्णु का कार्य करता है, दुर्गा को उत्पन्न करता है। वह रूप जो दुर्गा का कार्य करता है, शिव को जन्म देता है, वह रूप जो शिव का कार्य करता है, सूर्य को जन्म देता है और ऐसे ही यह चक्र चलता है। अतः कहीं भगवती ने विष्णु को मोहित कियाकहीं शिव विष्णु की आराधना किये कहीं इन दोनों के अधीन भगवती का रूप है। आदि आदि। लेकिन ध्यातव्य है कि हमने इन ब्रह्म के अलग अलग कार्यों को सम्पादित करने की स्थिति को अलग अलग तत्व मान लिया।

लेकिन तत्वज्ञ जनों ने कहा कि नहीं, सभी की बात हैं ही नहीं। यहाँ जो है एक ही है। कोई भिन्न नहीं। लेकिन लोग इसे देख नहीं पाये।

एक ही बिजली हैं। हीटर में गर्म, फ्रीज़ में ठण्ड, बल्ब में प्रकाश और फोन में ध्वनि उत्पन्न करती है। तो इसमें बताईये कि इन चारो में से कौन सी बिजली श्रेष्ठ है ? जो तत्वज्ञ है, वह जानता है कि वास्तव में कभी चार बिजली का अस्तित्व ही नहीं था। बिजली तो एक ही थी। माध्यम चार थे। जिसके कारण एक ही निराकार बिजली ने चार अलग अलग प्रतिक्रिया दी।

यदि है ब्रह्मज्ञानी का स्वभाव। उसे सभी भिन्न रूपों में भी एकता दिखाई देती है। और सांसारिकों को एक ही ब्रह्म में भिन्नता दिखाई देती है। जैसे एक ही जल में भिन्न वस्तुओं की परछाई पड़ने से वह भिन्न भिन्न रंग वाला दीखता है, पर है वास्तव में उनसे बिलकुल अछूता। ऐसे ही ये विष्णु, दुर्गा और शिव का जो रूप हम मान बैठे है वह उसी परछाई के असत्य के समान है जिसका कोई महत्व ही नहीं। वास्तव में उस जल में हमें कोई आकाश, बादल या पेड़ नहीं मिलेगा। क्योंकि वहाँ ऐसा कुछ है ही नहीं।

अब बात करते हैं लोकों की। वास्तव में वैकुण्ठ, कैलाश, मणिद्वीप आदि भिन्न कुछ है ही नहीं। यह एक स्थिति है। जहाँ सगुण उपासक जीव अपने ऐच्छिक रूप को पूजता है। जो शिव के उपासक हैं, वे भी उसी स्थिति को प्राप्त होते हैं और उन्हें उस स्थिति का सारा थीम शिवमय (शिव, पार्वती, नंदी, भृंगी आदि) दीखता हैं । विष्णु के उपासक भी उसी स्थिति को जाते हैं लेकिन वहाँ उन्हें अपना ही थीम दिखता है .. विष्णु प्रधान। भगवती के उपासकों के साथ भी यही हैं जाना सबको वहीँ है, क्योंकि साध्य, साधन और लक्ष्य एक ही है। लेकिन जैसे दो व्यक्ति के पास एक ही कंपनी का एक ही फोन होने के बाद भी वे उसमें अपनी इच्छा के अनुसार भिन्न भिन्न वालपेपर लगाकर रखते हैं, ऐसा ही वैकुण्ठ और शिवलोक कैलाश में भेद है। तत्वतः भेद कुछ नहीं है। स्वरूपतः भेद है। अतः जितने रूप उतने लोक यानी थीम। उस मोक्ष की स्थिति में राम के थीम को देखो तो साकेत दिखेगा, कृष्ण का थीम लगाओ तो गोलोक। और हाँ, ये केवल मोक्ष के लिए है। ब्रह्मादि लोक अति उच्चस्तरीय भौतिक हैं। अतः वहाँ भौतिक चीज़ें गम्य हैं। लेकिन यह मोक्ष की स्थिति भौतिक नहीं है। अतः यहाँ परमधाम में सब कुछ ब्राह्मी ऊर्जा से चलता है। ॐ ॐ ॐ

श्रीभागवतानंद गुरु
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संस्थापक सह महानिदेशक at आर्यावर्त सनातन वाहिनी
एस. जी. एम. कॉलेज, पंडरा रांची तथा प्रयाग संगीत समिति से शिक्षा प्राप्त, श्रीभागवतानंद जी अभी रांची में रह रहे हैं एवं रांची यूनिवर्सिटी में संस्कृत में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं|
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