राखी क्या है?

रक्षा बंधन पर्व लक्ष्मी जी का बलि को राखी बांधने से जुडा हुआ है। कथा कुछ इस प्रकार है एक बार की बात है, कि दानवों के राजा बलि ने सौ यज्ञ पूरे करने के बाद चाहा कि उसे स्वर्ग की प्राप्ति हो, राजा बलि कि इस मनोइच्छा का भान देव इन्द्र को होने पर, उनका सिहांसन डोलने लगा।
घबरा कर इन्द्र भगवान विष्णु की शरण में गये। भगवान विष्णु वामन अवतार ले, ब्राह्माण वेश धर कर, राजा बलि के यहां भिक्षा मांगने पहुंच गये। ब्राह्माण बने श्री विष्णु ने भिक्षा में तीन पग भूमि मांग ली। राजा बलि अपने वचन पर अडिग रहते हुए, श्री विष्णु को तीन पग भूमि दान में दे दी।
वामन रुप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग ओर दु
दूसरे पग में पृ्थ्वी को नाप लिया। अभी तीसरा पैर रखना शेष था। बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। ऐसे मे राजा बलि अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होगा। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहां तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए. वामन भगवान ने ठिक वैसा ही किया, श्री विष्णु के पैर रखते ही, राजा बलि सुतल लोक पहुंच गए।
बलि के द्वारा वचन का पालन करने पर, भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न्द हुए, उन्होंने आग्रह किया कि राजा बलि उनसे कुछ मांग लें। इसके बदले में बलि ने रात दिन भगवान को अपने सामने रहने का वचन मांग लिया। श्री विष्णु को अपना वचन का पालन करते हुए, राजा बलि का द्वारपाल बनना पडा। इस समस्या के समाधान के लिये लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया। लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे राखी बांध अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आई। इस दिन का यह प्रसंग है, उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। उस दिन से ही रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाने लगा।
एक बार देव और दानवों में युद्ध शुरु हुआ, युद्ध में देवता पर दानव हावी होने लगें। यह देखकर पर इन्द्र देव घबरा कर बृ्हस्पति के पास गये। इसके विषय में जब इन्द्राणी को पता चला तो उन्होने ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र कर इसे अपने पति के हाथ पर बांध लिया। जिस दिन यह कार्य किया गया उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था। उसी दिन से ही श्रावण पूर्णिमा के दिन यहा धागा बांधने की प्रथा चली आ रही है।
राखी का यह पर्व पुराणों से होता हुआ, महाभारत अर्थात द्वापर युग में गया, और आज आधुनिक काल में भी इस पर्व का महत्व कम नहीं हुआ है। राखी से जुडा हुआ एक प्रसंग महाभारत में भी पाया जाता है। प्रंसग इस प्रकार है। शिशुपाल का वध करते समय कृ्ष्ण जी की तर्जनी अंगूली में चोट लग गई, जिसके फलस्वरुप अंगूली से लहू बहने लगा। लहू को रोकने के लिये द्रौपदी ने अपनी साडी की किनारी फाडकर, श्री कृ्ष्ण की अंगूली पर बांध दी। चीर हरण के समय सहायता की फिर।
भारत के कई क्षत्रों में इसे अलग – अलग नामों से अलग – अलग रुप में मनाया जाता है। जैसे उतरांचल में इसे श्रावणी नाम से मनाया जाता है। भारत के ब्राह्मण वर्ग में इस इन यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इस दिन यज्ञोपवीत धारण करना शुभ माना जाता है। इस दिन ब्राह्माण वर्ग अपने यजमानों को यज्ञोपवीत तथा राखी देकर दक्षिणा लेते है। अमरनाथ की प्रसिद्ध धार्मिक यात्रा भी रक्षा बंधन के दिन समाप्त होती है।
भारत के राजस्थान राज्य में इस इद्न रामराखी और चूडा राखी बांधने की परम्परा है। राम राखी केवल भगवान को ही बांधी जाती है। व चूडा राखी केवल भाभियों की चूडियों में ही बांधी जाती है। यह रेशमी डोरे से राखी बनाई जाती है। यहां राखी बांधने से पहले राखी को कच्चे दूध से अभिमंत्रित किया जाता है और राखी बांधने के बाद भोजन किया जाता है।
भारत में स्थान बदलने के साथ ही पर्व को मनाने की परम्परा भी बदल जाती है, यही कारण है कि तमिलनाडु, केरल और उडीसा के दक्षिण में इसे अवनि अवितम के रुप में मनाया जाता है। इस पर्व का एक अन्य नाम भी है, इसे हरियाली तीज के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन से पहले तक ठाकुर झुले में दर्शन देते है, परन्तु रक्षा बंधन के दिन से ये दर्शन समाप्त होते है।
अब रक्षा की आवश्यकता तो सबों को है, सदा से है। अपने अस्तित्व के समय से है। अतः यह पूछना कि यह कब से चला आ रहा है, यह तो निहायत ही मूर्खतापूर्ण है। जैसे कोई यह पूछे कि दीपक कब से जलाया जा रहा है, तिलक कब से लगाया जा रहा है, स्नान कब से किया जा रहा है, भोजन कब से किया जा रहा है, गुरु का पूजन कब से किया जा रहा है। आदि आदि। हालाकि ये सब बड़े ही ओछे प्रश्न हैं । इनकी आवश्यकता रोज है। फिर भी दीपक के लिए दीवाली, तिलक हेतु होली, गुरु हेतु आषाढ़ पूर्णिमा, स्नान हेतु ऋषि पंचमी, अन्न हेतु अन्नकूट आदि की प्रथा सनातन में शाश्वत और आदिकाल से हैं। उसी तरह रक्षा की आवश्यकता रोज है, पर श्रावण पूर्णिमा को प्रधानता दी गयी। कारण कि श्रावणी होने से यज्ञोपवीत का भी विधान करना है न। यज्ञोपवीत भी एक उत्कृष्ट रक्षा सूत्र है। मौली या आधुनिक भाषा में राखी भी वैसा ही रक्षा सूत्र है। अतः कथा, प्रसंग, मुहूर्त आदि के आधार पर ही ऐसा किया गया। विशेष में लक्ष्मी, द्रौपदी, शची, बृहस्पति आदि के प्रसंग से सिद्ध किया जा चुका है कि बहन, पत्नी, गुरु आदि रक्षा सूत्र बाँध सकती हैं। यह सबों का त्यौहार है। पर मुगलकाल से यह भाई बहन तक सीमित हो गया। गुरुकुलों पर आक्रमण हुए। परम्पराओं का ह्रास हुआ और आप जैसों का उदय। अस्तु।
मौली या कलावा ही रक्षा सूत्र या राखी है। ये तो विक्षेपियों ने फैंसी डिज़ाइन वाली राखियां बनायीं। आप जो मौली बांधते हैं, वही रक्षा सूत्र या राखी है। कौन बांधता है आपको ? बहन या पुरोहित ? राखी दरअसल रक्षा सूत्र का अपभ्रंश है। कोई भी किसी कोई भी रक्षा सूत्र बाँध सकता है। पति पत्नी, माता पुत्र, गुरु शिष्य, पिता पुत्र, और हाँ, भाई बहन भी।
यही शास्त्र की आज्ञा है।
लेकिन कर्णावती और हुमायूँ की किंवदंती के बाद इसे भाई बहन प्रधान पर्व बता दिया गया। भाई बहन प्रधान पर्व भ्रातृद्वितीया (भाई दूज) है। हाँ, इस बात से मुझे घोर आपत्ति है कि इसका बहिष्कार हो। बल्कि होना तो यह चाहिए कि इसका भरपूर प्रयोग हो। व्यापक रूप से। यजुर्वेद का अप्रतिरथ सूक्त का अंतिम मन्त्र देखें कि कैसे गुरु अपने शिष्य को रक्षासूत्र बांधता है।
माध्यम कोई भी हो सकता है। पर स्वयम् से श्रेष्ठ जैसे दीदी, माता पिता, गुरु, ब्राह्मण को ही प्रधानता दी गयी है। आदि आदि। पोस्ट में अर्ध सत्य और अर्ध असत्य है।

क्या सूत्र रक्षा करता है या मंत्र ?
रक्षा मन्त्र करता है और सूत्र उसका माध्यम है। जैसे क्षुधा का नाश भोजन करता है और हाथ, बर्तन, दांत आदि माध्यम हैं। जैसे अंधकार का निवारण प्रकाश करता है दीपकादि उसके माध्यम हैं। जैसे अज्ञान का नाश ज्ञान करता है, और गुरु, पुस्तक, साधना आदि माध्यम हैं।
हाँ मन्त्र की उपयोगिता सदा से हैं। लोगों को इसे अवश्य जानना चाहियें । परंतु उसके ऊपर आश्रित नहीं होना चाहिए।
मन्त्र, तंत्र, यंत्र, आशीर्वाद, दान, औषधि, आदि अनेक उपाय हैं। केवल एक आयाम नहीं है।

भविष्योत्तर पुराण में भाईदूज की जो कथा मिलती है उसके अनुसार यमराज अपने कामकाज में इतने व्यस्त हो गए कि उन्हें अपनी बहन यमुना की याद भी नहीं रही। एक दिन यमुना से यमराज को संदेशा भिजवाया। बहन का संदेशा मिलते ही यमराज बहन से मिलने निकल पड़े।
भगवान यमराज अपनी बहन यमुना के घर पहुंचे तो यमुना ने यमराज के हाथों की पूजा की और अपने हाथ से भोजन बनाकर भाई को खाना खिलाया। भोजन के पश्चात संध्या के समय तक यमराज यमुना के घर में रहे। माना जाता है कि हर वर्ष यमराज यमद्वितीया यानी कार्तिक शुक्ल द्वितीया के दिन यमुना के घर आते हैं।
यमराज ने यमुना को वरदान दिया है कि जो भी व्यक्ति यमद्वितीया के दिन यमुना के जल में स्नान करता है और बहन के घर जाकर उनके हाथों से बना भोजन करता है उसकी आयु लंबी होती है। यमद्वितीया के दिन अगर यमुना में स्नान नहीं करते हैं तो बहन के घर जाकर बहन के हाथों से यमुना जल का टीका लगवाएं और उनके हाथों से बना भोजन करें तो इससे भी अकाल मृत्यु से रक्षा होती है।

अतः इससे भी सिद्ध होता है कि मंत्रज्ञ की प्राथमिकता अवश्य है, पर एकाधिकार नहीं।

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संस्थापक सह महानिदेशक at आर्यावर्त सनातन वाहिनी
एस. जी. एम. कॉलेज, पंडरा रांची तथा प्रयाग संगीत समिति से शिक्षा प्राप्त, श्रीभागवतानंद जी अभी रांची में रह रहे हैं एवं रांची यूनिवर्सिटी में संस्कृत में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं|
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