शङ्कराचार्य को समझें

आज किसी सज्जन ने कहा कि शंकराचार्य जी अरबपति बन कर बैठे हैं। कुछ करते धरते नहीं हैं। उन्हें मेरा उत्तर :-
यदि जगद्गुरु शंकराचार्य जी अरबपति हैं तो उन्हें होना भी चाहिए। वैसे भी वो संपत्ति पीठ की है, उनकी निजी नहीं, और न इसका उपयोग उनके निजी कार्य में हो रहा है।
शंकराचार्य जी या अन्य सनातनी वास्तविक संतों के पास करोड़ों या अरबों की संपत्ति है तो क्या हुआ ! उन्होंने कोई चोरी डकैती करके थोड़े न इकट्ठा किये हैं । उनकी संपत्ति को देखकर जलने वाले निंदकों या सेकुलरों ने फूटी कौड़ी भी नही दिया है उनको । उलटे उनसे किसी न किसी तरह लाभान्वित हुए हैं ।
जो भी दिया है उनके भक्तों और उनके ट्रस्टियों ने दिया है । दूसरों को उनकी संपत्ति के बारे में अनर्गल बकने का कोई अधिकार नही है । और वो संपत्ति भी उनके नाम नही अपितु उनके ही स्थानीय ट्रस्टियों के नाम में होती है ।
इसका सदुपयोग वे धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए ही करते हैं । दुष्ट व्यक्ति या विधर्मियों की तरह राष्ट्र विरोधी कार्यों में नही खर्चते हैं ।
मठाम्नाय महानुशासन पढ़िए।
कृते विश्वगुरुर्ब्रह्मा त्रेतायां ऋषि सत्तमः ।
द्वापरे वेदव्यासश्च अहमस्मि कलौयुगे।
महाराज सुधन्वा चौहान को भगवत्पाद आदिशंकर ने कहा था। सत्ययुग में ब्रह्मा, त्रेता में वशिष्ठ, द्वापर में वेदव्यास और कलियुग में मैं ही विश्वगुरु हूँ । शंकराचार्य के लिए छत्र , सिंहासन, चँवर भी अनिवार्य है। शंकर दिग्विजय के बाद इस पद को सनातन का राजा कहा गया। नागा, नाथ पंथी अखाड़ा साधुओं को सैनिक और जनसाधारण को प्रजा। अतः इसका पालन हो। राजा ही कंगाल रहेगा तो हमारा क्या होगा। कांची कामकोटि अधिपति जयेंद्र स्वामी जी हर वर्ष 5000 करोड़ से अधिक धन समाजसेवा में देते हैं। गरीबों का धर्मान्तरण होने से रोकते हैं। यदि उनके पास धन न रहे तो क्या आप अपने घर से देंगे, जब धर्मरक्षा की जरूरत होगी ? कौन शंकराचार्य धन का प्रयोग व्यक्तिगत विलासिता के लिए कर रहे हैं ?
शंकराचार्य मात्र चार हैं। इसके अलावा यदि कोई इस पद का स्वयं के लिए उपयोग कर रहा है, तो फ़र्ज़ी है। पूर्वाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, पश्चिमाम्नाय और उत्तराम्नाय। अर्थात् गोवर्धन, श्रृंगेरी, द्वारिका और ज्योति पीठ। इसके अलावा बाद में कार्य की अधिकता के कारण दक्षिणाम्नाय और पूर्वाम्नाय ने दो उपपीठ की स्थापना अलग से की। जिसमें सर्वाम्नाय कांची कामकोटि और ऊर्ध्वाम्नाय काशी सुमेरु उपपीठ बने। कुछ लोग उपपीठों की मान्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। पर ऐसा वही करते हैं जिन्हें मठाम्नाय महानुशासन की जानकारी नहीं। हर पीठ अपना एक और उपपीठ सर्वसम्मति से बना सकता है, यदि उसे आवश्यक लगे तो। और रही बात कार्य करने की, तो ऐसा नहीं है कि कार्य नहीं हो रहा। कार्य बहुत हो रहा है। अब जहाँ हो रहा है, वहां आप नहीं देखते और जहाँ आप देखते हैं, वहां वो नहीं देखते। इसमें शासन तंत्र का भी व्यापक दोष है। ईसाई मिशनरी पोषित सरकारें पर्याप्त अमर्यादा से सनातन गतिविधियों पर अंकुश लगाती रही है । साथ ही साईं, निर्मल, रामपाल, आर्य समाज, ब्रह्माकुमारी, स्वामी नारायण आदि के पाखंड के कारण और भी दयनीय स्थिति है।
आप सब थोड़ा सा विचार कीजिए । भगवान शंकर को एक बार विष पान करना पड़ा तोशीतलता के लिए गंगा व चंद्रमा को धारण करना पड़ा। आपके समक्ष भगवान शंकर के स्थान पर जो पूज्य शंकराचार्य दिखते हैं, उनमे से एक जगद्गुरु पूर्वाम्नाय ऋग्वेदी महामहिम श्री निश्चलानंद सरस्वती जी ने अपने जीवन में तीन बार विषपान किया है 25 बार शीशे का पानी दिया गया है, 5 बार मांत्रिक नागों से डसवाया गया है । अलकायदा उल्फा समेत
विश्व के सात खूंखार संगठनों के सर्वोच्च श्रेणी के हिट लिस्ट में जगद्गुरु का नाम है । फिर भी सामान्य तरीके से बिना कोई सुरक्षा लिए दहाड़ते हुए ट्रेन में पूरे देश में धर्म की ध्वजा को लेकर अपनी बोटी बोटी गलाते हुए फहरा रहे हैं । हमारे धर्म के सर्वोच्च पद पर विराजमान है ।
13 घंटे लेखन काम करते हैं , दो से 3 घंटे ही निद्रा लेते हैं । 73 वर्ष की भौतिक अवस्था में हजारों युवाओं की उर्जा से समन्वित वाणी बोलते हैं
ऐसे कोई साधारण व्यक्ति हो सकते हैं क्या ?
साक्षात शिव हैं । शंकरः शंकरः साक्षात्…
कितने वर्ष माह अथवा दिन ही आप प्रात: स्मरणीय शङ्कराचार्यों के साथ रहें हैं, घर में बैठकर वाट्सअप में तो किसी को कुछ भी कह सकते हैं, महत्त्वपूर्ण यह है कि हम कितने वास्तविक धरातल पर अपने धर्म संस्कृति के लिए कार्य कर रहे हैं, यहाँ यही चर्चा दु:खद है कि बिना विचारे किसी भी संत के ऊपर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं ।
महोदय ! सोच बदलिए । शंकराचार्य के प्रति इस प्रकार सोचना सही नही है ।आप सोच को परिवर्तन करे तो अच्छा रहेगा । शंकराचार्य को केवल अरबों की संपत्ति का संरक्षक कह सकते है। इसके विपरीत सोच ठीक व मान्य नहीं है ।
इत्यलम्। ॐ ॐ ॐ

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संस्थापक सह महानिदेशक at आर्यावर्त सनातन वाहिनी
एस. जी. एम. कॉलेज, पंडरा रांची तथा प्रयाग संगीत समिति से शिक्षा प्राप्त, श्रीभागवतानंद जी अभी रांची में रह रहे हैं एवं रांची यूनिवर्सिटी में संस्कृत में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं|
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