क्या हैं श्रावणी कर्म?श्रावणी पर्व का पौराणिक महत्व

प्राचीन काल से ही तिथि, पर्व और उपासना का विशेष महत्व रहा है। आधुनिक वैश्विक प्रगति में जहां हमारा देश नई-नई बुलंदियों को छू रहा है, वहीं अपनी प्राचीन मान्यताओं को भी बड़ी सहजता से संजोए हुए है। यद्यपि कुछ पर्वों के मनाने में कुछ आधुनिकता भी आ गई है लेकिन मूल तत्व से जुड़ाव नहीं टूटा है। 

हमारी सनातन वैदिक सामाजिक व्यवस्था में वर्णाश्रम धर्म का विशेष महत्व रहा है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र इन चार वर्ण व्यवस्थाओं में भारत का प्राचीन समाज आज की अपेक्षाकृत कहीं अधिक व्यवस्थित एवं अनुशासित था। वर्णव्यवस्था में विकारयुक्त भेद कुछ सदियों के बाद शुरू हुआ लेकिन अब वह प्रायः समाप्त मात्र है।
चार वर्णों, चार पुरुषार्थों में विभक्त प्राचीन वैदिक व्यवस्था में भारतवर्ष में चार ही प्रमुख राष्ट्रीय पर्व हुआ करते थे, जिनमें प्रथम वर्ण ब्राह्मण द्वारा संयोजित श्रावणी रक्षाबंधन पर्व; जो राष्ट्र की आध्यात्मिक शक्ति को पूंजीभूत करने का पर्व था। दूसरा विजया दशमी जो क्षत्रिय वर्ण द्वारा संयोजित राष्ट्र की सैन्य शक्ति को सुसज्जित करने का पर्व। तीसरा महालक्ष्मी पूजा दीपावली पर्व वैश्य वर्ण द्वारा राष्ट्र की अर्थशक्ति को व्यवस्थित करने का पर्व और चौथा होली शूद्रवर्ण के संयोजन में समग्र राष्ट्र की शक्ति को पूंजीभूत करने का समन्वयात्मक पर्व के रूप में प्रचलित था।
चारों पर्व, चारों वर्णों की आध्यात्मिक शक्ति, सैन्य शक्ति, अर्थशक्ति एवं पुरुषार्थ प्रधान शक्तियों को राष्ट्र को सुदृढ़ करने के लिए समन्वयात्मक प्रयास ही इन पर्वों के प्रमुख उद्देश्य थे। इसी कारण अनेक बार विदेशी आक्रांताओं द्वारा देश को छिन्न-भिन्न करने के क्रूर प्रयासों के बाद भी हम आज विश्व के समक्ष अपनी अस्मिता को सुरक्षित रख सके हैं और भारतवर्ष के नवसृजन में सतत अग्रसर हैं।
श्रावणी पर्व पर किए जाने वाले रक्षा विधान में वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से अभिमंत्रित किया जाने वाला कलावा केवल तीन धागों का समूह ही नहीं है अपितु इसमें आत्मरक्षा, धर्मरक्षा और राष्ट्ररक्षा के तीनों सूत्र संकल्प बद्ध होते हैं। प्राचीन मान्यताओं से इस पर्व को मानने वाले श्रद्धालु इस दिन नदियों के जल में खड़े होकर विराट भारत की महान परंपराओं का स्मरण करते हुए संकल्प करते हैं जिसे हेमाद्रि संकल्प अर्थात्‌ हिमालय जैसा महान संकल्प का नाम दिया हुआ है।
इसमें सर्वप्रथम मनुष्य को नाना प्रकार के पाप, दुराचरण और समाज विरुद्ध कर्मों से दूर रहने तथा उनके प्रायश्चित्‌ की बात कही है। इस संकल्प में प्राचीन भारत के वन प्रदेशों जैसे बद्रिकारण्य, दंडकारण्य, अरावलीवन, गुह्यरण्य, जंबुकारण्य, विंध्याचलवन, द्राक्षारण्य (अंगूर के वन), नहुषारण्य, काम्यकारण्य, द्वैतारण्य, नैमिषारण्य, अवन्तिवन आदि प्राचीन भारत के विराट एवं समृद्धशाली वन प्रदेशों का स्मरण किया जाता है।
इसके बाद पर्वत मालाओं का जिसमें सुमेरूकूट (पर्वत), निषिधकूट, शुभ्रकूट, श्रीकूट, हेमकूट (हिमालय) रजकूट, चित्रकूट, किष्किन्धा, श्वेताद्रि, विंध्याचल, नीलगिरि, सह्याद्रि कश्मेरू आदि उन समस्त पर्वत श्रृंखलाओं को याद किया जाता है जिनमें से कुछ अब वर्तमान भारतवर्ष की सीमा से बाहर हैं।
इसके बाद तीर्थ क्षेत्रों शिव-शक्ति उपासना स्थलों के साथ सिंधु और ब्रह्मपुत्र नदी एवं गंगा, गोदावरी, सतलुज, गंडकी, तुंगभद्रा, नर्मदा, कृष्णा, कावेरी आदि प्राचीन विराट भारत में प्रवाहित होने वाली पवित्र नदियों को संकल्प में पिरोया गया है।
ताकि हम अपनी प्राचीन अखंड विरासत का स्मरण कर वर्तमान में श्रावणी पर्व पर यह संकल्प लें कि भारत की सार्वभौमिक एकनिष्ठ, विश्वबंधुत्व की भावना हमें एकसूत्र में बंधने की प्रेरणा प्रदान करें तथा राष्ट्र में कोई भी विघटनकारी ताकत अपना सिर न उठा सकें। इस संकल्प के बाद वेद मंत्रों से अभिमंत्रित यज्ञोपवीत धारण कर हाथ की कलाई में रक्षासूत्र बांधा जाता है।
कुछ सदियों से रक्षा बंधन का पर्व भाई-बहन के स्नेह के पर्व के रूप में प्रसिद्ध हो गया है। इसे एक और नई उपलब्धि कहा जा सकता है क्योंकि भाई अपनी बहनों से राखी बंधवा कर उसे यह विश्वास दिलाते हैं कि इस पवित्र बंधन के माध्यम से वह तुम्हारी सदैव देखभाल करता रहेगा। चाहे कोई भी परिस्थिति, कैसी भी समस्या आ जाए, उसका भाई हमेशा उसकी रक्षा करेगा।
इस प्रकार यह पर्व भारत की विराट आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परंपरा श्रावणी उपाकर्म के तीन पक्ष है- प्रायश्चित संकल्प, संस्कार और स्वाध्याय। सर्वप्रथम होता है- प्रायश्चित रूप में हेमाद्रि स्नान संकल्प। गुरु के सान्निध्य में ब्रह्मïचारी गाय के दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र तथा पवित्र कुशा से स्नानकर वर्षभर में जाने-अनजाने में हुए पापकर्मों का प्रायश्चित कर जीवन को सकारात्मकता से भरते हैं। स्नान के बाद ऋषिपूजन, सूर्योपस्थान एवं यज्ञोपवीत पूजन तथा नवीन यज्ञोपवीत धारण करते हैं।
यज्ञोपवीत या जनेऊ आत्म संयम का संस्कार है। आज के दिन जिनका यज्ञोपवित संस्कार हो चुका होता है, वह पुराना यज्ञोपवित उतारकर नया धारण करते हैं और पुराने यज्ञोपवित का पूजन
भी करते हैं । इस संस्कार से व्यक्ति का दूसरा जन्म हुआ माना जाता है। इसका अर्थ यह है कि जो व्यक्ति आत्म संयमी है, वही संस्कार से दूसरा जन्म पाता है और द्विज कहलाता है।
उपाकर्म का तीसरा पक्ष स्वाध्याय का है। इसकी शुरुआत सावित्री, ब्रह्मा, श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, स्मृति, सदसस्पति, अनुमति, छंद और ऋषि को घी की आहुति से होती है। जौ के आटे में दही मिलाकर ऋग्वेद के मंत्रों से आहुतियां दी जाती हैं। इस यज्ञ के बाद वेद-वेदांग का अध्ययन आरंभ होता है। इस प्रकार वैदिक परंपरा में वैदिक शिक्षा साढ़े पांच या साढ़े छह मास तक चलती है। वर्तमान में श्रावणी पूर्णिमा के दिन ही उपाकर्म और उत्सर्ग दोनों विधान कर दिए जाते हैं। प्रतीक रूप में किया जाने वाला यह विधान हमें स्वाध्याय और सुसंस्कारों के विकास के लिए प्रेरित करता है।

श्रीभागवतानंद गुरु
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संस्थापक सह महानिदेशक at आर्यावर्त सनातन वाहिनी
एस. जी. एम. कॉलेज, पंडरा रांची तथा प्रयाग संगीत समिति से शिक्षा प्राप्त, श्रीभागवतानंद जी अभी रांची में रह रहे हैं एवं रांची यूनिवर्सिटी में संस्कृत में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं|
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