नाद के गुंजन का महत्व

द्वापर युग में विदुर ने धृतराष्ट्र को कहा था कि किसी के भी घर नास्तिक, नीच या दुष्ट संतान को जन्म नहीं लेना चाहिए। सज्जन पुरुष को भी ऐसे लोगों से दूर बहन चाहिए। मगर ठीक इसके उलट आज कलियुग के मात्र 3200 साल बीतने पर इस भारत भू पर नास्तिक बनने की एक नई संस्कृति चल पड़ी है। आज 0के बुद्धिजीवी मानव इस बात पर प्रतिस्पर्धा नहीं करते कि किसमें कितना श्रद्धा भाव है अपितु इस बात की होड़ करते हैं कि वो कितने बड़े नास्तिक हैं। चूँकि धर्म आस्था एवं विश्वास के स्तम्भों पर ही स्थित है आज का नास्तिक भले ही समाज में उच्च स्तर का हो इसे सनातन हिन्दू धर्म में निम्न कोटि का ही समझा जाएगा। पंचम मूल जगद्गुरुतम कृपालु जी महराज कहते हैं कि
“जब कोई नास्तिक इस बात को कहता है कि वो भगवान् को नहीं मानता, तब वस्तुतः वह यह स्वीकार करता है कि भगवान् नाम की कोई शक्ति है जिसमें वो विश्वास नहीं रखता। क्योंकि जब कोई वस्तु होगी तभी तो उसमें विश्वास रखने या ना रखने का प्रश्न उत्पन्न होगा। किसी भी व्यक्ति का यही विश्वास उसे नास्तिक से आस्तिक बनाता है।”
आखिर हम नास्तिकता की बात कर क्यों रहे हैं? वो इसलिए की कुछ नास्तिक अथवा नास्तिक से आस्तिक बने कुछ लोग आज सनातन हिन्दू धर्म के पुरातन रीति रिवाजों ना सिर्फ प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं अपितु पौराणिक मान्यताओं को भी नकार रहे हैं। ऐसे लोग हिन्दू धर्म की मान्यताओं के लिए नवीन युग में ढूंढे गए वैज्ञानिक तथ्यों को भी अस्वीकार कर देते हैं तो इसका एकमात्र कारण उनमें श्रद्धा भाव का पूर्ण अभाव है।
पिछले साल उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में बनी समाजवादी पार्टी की सरकार ने ईद व् रोजों के समय मंदिरों से लाउडस्पीकर यानि भोंपू उतारने के निर्देश दिए थे। ये एकतरफा फैसला मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ही था क्योंकि दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव, नवरात्रि, शिवरात्रि, जन्माष्टमी आदि हिन्दू पर्वों पर तो मस्जिदों के लाउडस्पीकर नहीं उतारे जाते। आखिर हिन्दू ही निशाने पर क्यों?
वर्तमान में पुनः ऑनलाइन सोशल मीडिया पर पुनः मंदिरों के लाउडस्पीकर उतारने की बात चली है। हाँ कुछ लोग मस्जिदों के भी लाउडस्पीकर उतारने को कह रहे हैं। परन्तु मेरा उद्देश्य यहाँ हिन्दू मंदिरों के ध्वनि यंत्रों की रक्षा का है।
स्वर और उससे विस्फुटित ध्वनि का हिन्दू धर्म में अत्यधिक महत्व है। गुरू द्वारा शिष्य को दिए गए बीजमंत्र के अलावा प्रत्येक मन्त्र, श्लोक तथा चौपाई का उच्च से उच्चतम स्वर में पाठ से अधिक पुण्यफल की प्राप्ति होती है तथा वातावरण भी शुद्ध होता है। इसके साथ ही इस पाठ को सुनने वालों पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है।
श्रीदुर्गासप्तशती के पाठ से पूर्ण ही आता है कि इसका अल्प स्वर में पाठ से स्वफल की प्राप्ति होती है जबकि उच्च स्वर में पाठ से पूर्णफल प्राप्त होता है। श्रीदुर्गासप्तशती के पढ़ने व् सुनने से मिले पुण्य की समाप्ति कभी नहीं होती। ध्वनि संयंत्र यानि लाउडस्पीकर की अत्याधिक आवश्यकता यहीं पड़ती है।
श्रीदुर्गासप्तशती में ही एक श्लोक आता है

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥

अर्थात :- देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।

हिन्दू मंदिरों में घण्टा, ढोल, नगाड़ों, घंटियों, शंख, मंजीरा, करताल, आदि से जो नाद उत्पन्न किया जाता है उससे ना सिर्फ सुनने वाले प्राणी अभय प्राप्त करते हैं बल्कि दुष्ट शक्तियों का भी विनाश होता है। प्रतिदिन मंदिर में आरती के साथ नाद सुनने वाले की अकाल मृत्यु नहीं होती और उसके सभी प्रकार के गृह दोष, पितृ दोष एवं देव दोष शांत होते हैं।
मंदिर से गूंजने वाले मन्त्रों, आरती, कथा व् नाद के स्वर को द्विगुणित या इससे भी अधिक बढ़ाने के लिए वर्तमान में ध्वनि सयंत्र यानि लाउडस्पीकर का प्रयोग किया जाता है। अब प्रश्न यह है कि जब लाउडस्पीकर नहीं था तब नाद ध्वनि को बढ़ाने के लिए क्या किया जाता था?
इस प्रश्न का उत्तर छिपा है महाराष्ट्र स्थित स्तम्भ मंदिर में जहाँ खम्भों से विभिन्न प्रकार के संगीत स्वर, शंख ध्वनि, तथा अन्य स्वर उतपन्न किये जाते थे। इस मंदिर का गुम्बद इन स्वरों की ध्वनि को और बढ़ा देता था।
इसका दूसरा उतर है बीजापुर में अकबर की कब्रगाह जो पहले एक मंदिर हुआ करती थी। यहाँ प्रत्येक स्वर की प्रतिध्वनि सुनाई देती है खासकर ॐ की गुंजन काफी समय तक गूंजती रहती है।
मेरे एक मित्र ने दिल्ली की अनाधिकृत कॉलोनियों में से एक कॉलोनी में किसी निजी बिल्डर द्वारा निर्मित बिल्डिंग (भवन) में एक फ्लोर (मंजिल) ख़रीदा। बिल्डिंग के ठीक बाईं ओर एक श्मशान घाट है। मेरे मित्र के घर से जलती हुयी चिताएँ प्रत्यक्ष दिखाई देती हैं और कभी कभार शवदाह की बदबू भी घर में प्रवेश कर जाती है। ऐसा सिर्फ मित्र की बिल्डिंग का ही नहीं बल्कि गली में स्थित अन्य घरों का भी यही हाल है। परंतु मेरे मित्र तथा उसके पड़ोसियों के लिए यह वातावरण भयावह ना होकर शांत है। इसकी वजह है मेरे मित्र की बिल्डिंग और श्मशान घाट के मध्य स्थित दुर्गा मंदिर। जब मंदिर की प्राचीर से लाउडस्पीकर से शंख, घण्टा, ढोल, आदि के नाद के साथ मंत्रोच्चारण व् आरती की ध्वनि होती है तो सम्पूर्ण वातावरण तथा तमाम सुनने वाले निर्भय एवं पवित्र हो जाते हैं। सबसे बड़ी बात महिलायें व् बुजुर्ग बिना मंदिर जाए अपने घरों में बैठे-बैठे कथा श्रवण कर लेते हैं – इस लाउडस्पीकर की वजह से।

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