वेद, आयुर्वेद और मांसाहार

हम रोजाना उठते हैं, प्रार्थना में अपने शास्त्रों का पठन करते हैं और समझते हैं कि हमारे पुरखों ने ग्रन्थ लिखे, हम तक ऐसे के ऐसे पहुंचे और हम उनको पढ़कर लाभान्वित हो रहे हैं। अगर आप ऐसा समझते हैं तो हम सरासर गलत हैं।
वेद प्रकृति की उत्पति के पश्चात भगवान् ब्रह्मा द्वारा लिखा गया। इस समय तक वेद एक ही था। भगवती सरस्वती यानि वाक् ने वेद को लयबद्ध कर गाया। जिस भाषा में ब्रह्मा द्वारा वेद लिखे गए और जिस भाषा में देवी वाक् द्वारा गाये गए, वह देवभाषा थी।
भगवान् धन्वतंरी, जोकि लक्ष्मी के साथ समुद्रमंथन से सागरपुत्र हो प्रकट हुए थे, उनके पुत्र अश्विनी कुमारों ने आयुर्वेद की रचना की।
इस काल तक चिरञ्जीवी महऋषि वेदकव्यास ने वेद के तीन व्यास किए – सामवेद, यजुर्वेद, और ऋग्वेद, एवं कालांतर में वेदों का अर्थ समझाने के लिए इन तीन वेदों का पुनः व्यास कर अर्थववेद उत्पन्न किया था। वेदकव्यास ने वेद का संकलन कर उनके व्यास किए व् , लिपिबद्ध किया था। वेदकव्यास वेदों के रचियता नहीं बल्कि सम्पादक थे, रचियता थे भगवान् ब्रह्मा।
देवताओं के कई नियमों में से एक नियम होता है, वो यह कि यदि कोई भी देवता पशुवृत कार्य करता है, जैसेकि मांस-मदिरा का सेवन करना या किसी अन्य को इसके लिए प्रेरित करना, तो उसका देवत्व छीन जाता और दोषी देवता को मानव या पशु बन धरती पर रहना पड़ता है। कोई भी देवता इस नियम का उल्लंघन करके नहीं बच सकता।

हमारे सभी शास्त्र – देवलोक का एक वेद, धरा के चारों वेद, आयुर्वेद, दर्शन, वेदांत, सांख्य, पुराण, वाल्मीकि रामायण व् महाभारत – देवभाषा में लिखे गए थे और इनकी लिपि थी ब्राह्मी।
इस देवभाषा को संस्कृत समझने की भूल मत कीजिएगा।

स्वामी अरविंदो घोष ने अपने जीवन को खपा कर दो बातों को सिद्ध किया –
१. संस्कृत सब भाषाओं की जननी है। मनुष्य ने जब बोलना शुरू किया तो उसकी पहली बोली, लेखिनी और व्याकरण देवभाषा ही थी।
२. जो संस्कृत सब भाषाओं की जननी है वह देवभाषा थी, आज की संस्कृत उससे भिन्न है, हाँ इसने अपनी जननी भाषा के कई रूपों व् गुणों को ऐसे का ऐसा सम्भाल कर रखा है।
पहले देवभाषा से संस्कृत में बदलाव हुआ जिसके दौरान तमिल, ग्रीक व् लैटिन भाषाओं का उदय हुआ। इस बदलाव के दौरान सभी शास्त्र (देवलोक के एकम वेद को छोड़कर) सभी पुनः लिखे गए।

इसके बाद संस्कृत की ब्राह्मी लिपि से देवनागरी लिपि में बदलाव हुआ। इस बदलाव के समय भारत पहले मुगलों का गुलाम था फिर अंग्रेजों का गुलाम बना। इसी लिपि-भाषा के अंतिम बदलाव के समय ही मानव इतिहास का सबसे बड़ा सांस्कृतिक घपला हुआ।

ब्राह्मी से सभी शास्त्र पहले अरबी, उर्दू और अंग्रेजी में लिखे गए, फिर इन्हें संस्कृत की देवनागरी में लिखा गया। इसी समय बौद्ध धर्म सर उठा रहा था, तो कुछ ग्रन्थ देवनागरी में आने से पहले पाली व् प्राकृत में अनुवादित हुए थे तो कुछ ग्रन्थ कभी देवनागरी में लिखे ही नहीं गए थे।
आपको क्या लगता है कि इस्लाम, ईसाईयत और बौद्ध धर्म इतने उदार थे कि वो हमारे शास्त्रों का अनुवाद एकदम सही करेंगे तो आप आज के समय में उपलब्ध शास्त्रों को आँख मूंदकर सही मान सकते हैं। मगर ऐसा बिल्कुल नहीं हैं। अधिकतर पुराने शास्र या तो उपलब्ध नहीं हैं, यदि हैं तो उनमें इतने परिवर्तन हो चुके हैं कि आप उनकी पहचान शायद ही कर सकें।

उपपुराण, ब्राह्मण व् उपनिषदों की रचना तो बाद में देवनागरी लिपि धारी संस्कृत में हुई थी, फिर भी उनकी असल पाण्डुलिपियाँ उपलब्ध नहीं हैं।
अब आते हैं अश्विनी कुमारों द्वारा रचित आयुर्वेद पर। आज जो आयुर्वेद आप संस्कृत, हिंदी या अंग्रेजी में पढ़ते हैं वो अब अश्विनी कुमारों द्वारा रचित कहाँ रहा? उसे तो सुश्रुत से लेकर आज तक के कितने आयुर्वेद व् यूनानी के तथाकथित आचार्यों ने अपने मनमाफिक लिखा हुआ है।
आप वाग्भट्ट की बात करते हैं, मैं पूछता हूँ कि कौन से वाग्भट्ट की? विकिपीडिया का पृष्ठ https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%AD%E0%A4%9F कहता है कि चार वाग्भट्ट थे जिनमें से जो बौद्ध वाग्भट्ट थे उन्होंने अष्टांग संग्रह की रचना की थी। जब बौद्ध धर्म ही मांसाहार का पक्षधर है तो क्या बौद्ध वाग्भट्ट मांसाहार की रक्षा अपने ग्रन्थ में नहीं करेगा?
आइये जरा चरक संहिता पर प्रकाश डालते हैं। महर्षि चरक द्वारा देवभाषा की ब्राह्मी लिपि में लिखित चरक संहिता आज असल कहाँ रही? खुद विकिपीडिया का पृष्ठ कहता है कि
“चरकसंहिता में पालि साहित्य के कुछ शब्द मिलते हैं। `चरकसंहिता’ आज हमें जिस रूप में उपलब्ध है, संभवतया उसकी रचना मूलत: आत्रेय के एक प्रतिभावान शिष्य अग्निवेश ने ईसापूर्व ७वीं अथवा ८वीं शताब्दी में की थी। इसमें आत्रेय की शिक्षाओं का समावेश है। अग्निवेश का ग्रन्थ ११वीं शताब्दी ईं। तक उपलब्ध रहा प्रकट होता है।

समय के साथ-साथ आयुर्वेदिक चिकित्सा शास्त्र के नये सिद्धांत बनते गये, नये-नये उपचार आदि की खोज होती रही। तब यह आवश्यक समझ गया कि अग्निवेश तंत्र का संशोधन किया जाये और यह कार्य चरक ने किया जो सम्भवताय ईसापूर्व १७५ में रहे होंगे। इसी संशोधित संस्करण को `चरक संहिता’ के नाम से जाना गया। इसे नवीं शताब्दी ईं। में एक कश्मीरी पंडित व द्रधबल ने पुन: संशोधित एवं सम्पादित किया और यही संस्करण अब हमें उपलब्ध है।”
संदर्भ – https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%9A%E0%A4%B0%E0%A4%95_%E0%A4%B8%E0%A4%82%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A4%BE
सुश्रुत पर विकिपीडिया का पृष्ठ भी कुछ कहता है
“सुश्रुत संहिता में सुश्रुत को विश्वामित्र का पुत्र कहा है। ‘विश्वामित्र’ से कौन से विश्वामित्र अभिप्रेत हैं, यह स्पष्ट नहीं।”
संदर्भ – https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%81%E0%A4%A4
अब आपको निर्णय करना है कि वर्तमान में उपलब्ध आयुर्वेद, वाग्भट्ट का अष्टांग हृदय, चरक संहिता और सुश्रुत संहिता अपने मूलरूप को सहेजे हुए असली ही हैं अथवा नहीं।
किसी भी शास्त्र पर ऊँगली उठाने से पूर्व देख लें कि उस शास्त्र की पाण्डुलिपि यानि असल प्रति जिसमें वो लिखा गया था उपलब्ध है या नहीं।

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