अम्बेडकर और दलितिस्तान

भीमराव अम्बेडकर ने आज़ादी की लड़ाई में कोई भूमिका नहीं निभाई थी। भले ही वो दलितों की लड़ाई लड़े हों, यदि उनके मनसूबे पूरे होते तो आज आप भारत, पाकिस्तान, और बांग्लादेश (तब का पूर्वी पाकिस्तान) के साथ भारत की ही जमीन पर बना हुआ एक और देश देखते जिसका नाम होता “दलितिस्तान”।

अंग्रेजों ने भारत के बंटवारे को मुस्लिम अवार्ड को आधार बनाया था जिसमें मुस्लिम इलेक्टोरेट होते थे। इसी तर्ज पर 1930-32 तक लन्दन में हुए गोलमेज सम्मेलनों (Round Table Conferences) में दलितों के हिमायती डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर की जोरदार पैरवी और दबाव के कारण साम्प्रदयिक अवार्ड (Communal Award) घोषित किये गए जिसमें दलितों के लिए अलग इलेक्टोरेट्स का प्रावधान रखा गया। बताते चलें कि इलेक्टोरेट्स आजकल की आरक्षित सीटों से ज्यादा भयानक होते हैं, एक इलेक्टोरेट में आरक्षित मजहब या जाति वाले लोग ही वोट डाल सकते हैं और जाहिर है कि वो अपने मजहब/जाति वाले को ही जिताएंगे। दलितों के लिए घोषित अवार्ड का नाम तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री के नाम पर “रामसे मैकडोनाल्ड कम्युनल अवार्ड” (Ramsay Macdonald Communal Award) रखा गया था। ये अवार्ड लन्दन से चलकर भारत पहुंचा और इसके बाद ब्रिटिश भारत के संविधान में जुड़ना था। यदि यह अवार्ड संविधान में जुड़ जाता तो 1946 में पाकिस्तान के साथ “दलितिस्तान” को बनने से कोई नहीं रोक सकता था। मगर तब एक ऐसे व्यक्ति ने इसे रोका जिसे इस अवार्ड का समर्थक समझा जा रहा था और ऐसे रोका कि ब्रिटिश सरकार ने पहली बार उस शख्सियत के सामने वास्तव में घुटने टेके।

भारत का एक और विभाजन रोकने वाले व्यक्ति थे – मोहनदास कर्मचन्द गाँधी। गाँधी ने पुणे की यरवदा जेल में इस अवार्ड को रोकने के लिए आमरण अनशन किया और अंततः विजयी हुए। ब्रिटिश सरकार को अवार्ड रोकना पड़ा। इसके बदले में, दलितों के उत्थान के लिए एक समझौता हुआ जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। इस समझौते पर गाँधी व् अम्बेडकर के साथ महामना मदनमोहन मालवीय, जोगिंद्र मण्डल तथा अन्य दलित नेताओं ने भी हस्ताक्षर किए थे। आज़ादी के बाद यही पूना पैक्ट भारत के संविधान में दलितों के लिए आरक्षण का आधार बना।

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