आज़ादी मिलने और विभाजन की कहानी

हमारा देश कोई लड़कर आज़ाद नहीं हुआ, जो अपनी मर्ज़ी से विभाजन करता| पहले आज़ादी कैसे मिली ये पढ़ लो, फिर विभाजन की दास्तान सुनियेगा| अंग्रेज़ द्वितीय विश्व युद्ध के समय बहुत कमजोर थे, इतने कि वो जर्मनी, खासतौर पर हिटलर, के रहमोकरम कर जिन्दा थे| कमोबेश यही हालत अमेरिका का था|

फ्रांस को जर्मनी पहले ही जीत चुका था| इसी समय भारत में कांग्रेस के राष्ट्राध्यक्ष सुभाष चन्द्र बोस थे| १९३९ में पुनः चुनाव से पूर्व के० एम० मुंशी और गोबिंद बल्लभ पन्त ने गांधी को अंग्रेजों की इंटेलिजेंस की फ़ाइल दिखाई थी कि सुभाष बाबू जर्मनी, इटली, रूस और जापान के नुमाइंदों से बम्बई में मिल सशस्त्र क्रान्ति और एक बड़े आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं| इसी समय नेताजी ने भारत में प्रोविजनल गवर्नमेंट बना बापू को इसका राष्ट्राध्यक्ष बनाने की बात रखी| मगर इतना बड़ा कदम उठाने कि कांग्रेस की औकात नहीं थी, क्यूंकि कुत्तों को घी और उल्लुओं को सूर्यप्रकाश हज़म नहीं होता| इसके खारिज होने पर सुभाष ने गाँधी को “भारत छोड़ो आन्दोलन” चलाने के लिए कहा, तब गांधी ने कहा कि अभी देश में हिम्मत नहीं है और वो ब्रिटेन की लाश पर नए भारत का निर्माण नहीं कर सकते, हमें युद्ध में अंग्रेजों का साथ देना पड़ेगा|

सुभाष बाबू को गांधी ने धक्के देकर कांग्रेस से निकाल दिया और समेत बड़े भाई के उनको तीन साल के लिए बैन कर दिया| द्वितीय विश्व युद्ध का फायदा उठाने के लिए नेताजी देश से बाहर चले गए और प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया एवं द्वितीय आज़ाद हिन्द फौज का गठन कर मिजोरम तक पहुंचे| अफ़सोस की नेताजी का पहले प्रयास कामयाब नहीं हो पाया| युद्ध के बाद जब आज़ाद हिन्द फौज के सैनिक देश पहुंचे और प्रेस से सेंसरशिप हटी तो नेताजी के क़दमों के बारे में देश को मालूम पड़ा| कांग्रेस, गांधी, नेहरु व् पटेल की जगह आज़ाद हिन्द फौज के सैनिकों ने ले ली और पूरे देश में सशस्त्र क्रान्ति की लहर फ़ैल गयी| इसी समय अंग्रेजों ने कांग्रेसियों और लीगियों को लेकर “इन्टेरिम गवर्नमेंट” बनाई जिसका कार्यकाल सन 2000 तक था, आगे जाकर दोनों देशों का विभाजन होता और चुने हुए प्रतिनिधि अपना संविधान भी बनाते मगर ना राज्यों में राज्यपाल होते ना ही केंद्र में राष्ट्रपति| इसके साथ ही नौकरशाह ब्रिटिश आई०सी०एस० होते और सेना अंग्रेजों की ही होती| दोनों देशों को नौकरशाहों और सेना के रखरखाव का पैसा देना होता|

मगर होनी को कुछ और मंजूर था| 1946 के मध्य में रॉयल इंडियन नेवी में क्रान्ति हुयी और 20,000 रेटिंग्स, 13 युद्ध पोत और 20 बंदरगाह बगावत पर चले गए| आर्मी की 2 और एयरफोर्स की 1 बटालियन ने भी विद्रोह कर दिया| समस्त सेनाओं में बगावत की लहर फ़ैल गयी| रॉयल इंडियन नेवी के जवानों ने खुद को “इंडियन नेशनल नेवी” घोषित कर दिया और युद्ध की घोषणा कर दी| क्यूंकि युद्ध के लिए एक कुशल राजनेता की आवश्यकता होती है इसके लिए कांग्रेस और मुस्लिम लीग को पैगाम भेजा गया कि हमें एक राजनेता दो जो युद्ध में हमारा नेतृत्व कर सके, हम युद्ध कर पूरा देश जीत कर आपको दे देंगे, जो मर्ज़ी करना| मगर कांग्रेस को तो मुफ्त की सत्ता बिना लड़े चाहिए थी| दोनों पार्टियां कांग्रेस और मुस्लिम लीग राज करना चाहती थी जो बिना विभाजन के नहीं हो सकता था| अंग्रेजों ने विभाजन कर देश के टुकडे कर कांग्रेस और मुस्लिम लीग को देने का लालच दिया, इसके बदले में दोनों पार्टियों ने बगावत ही दबा दी| नेहरु-पटेल-गांधी ने कहा कि जो सैनिक बगावत कर रहे हैं, वो बगावत छोड़ दें, उनके खिलाफ कोई मुकदमा नहीं होगा, सजा नहीं होगी और देश के आज़ाद होने के बाद उन्हें दोबारा सेना में रखा जाएगा|
ठीक इस बगावत की चिंगारी के डूबने के बाद क्लेमेंट एटली ने हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट रखा, जिसकी निम्न शर्तें थी-

  1. भारत के विभाजन होंगे- धर्म और जाति के अदाहर पर, मुखत्या अभी दो विभाजन होंगे – भारत और पाकिस्तान
  2. सभी 525 प्रिंसली स्टेट्स को छूट होगी कि वो किस देश में जाना चाहते हैं या अपना अलग देश घोषित करना चाहते हैं
  3. दोनों देशों को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर के तहत डोमिनियन स्टेटस के अंतर्गत आज़ादी मिलेगी और इन्हें जल्द संविधान का निर्माण करना पड़ेगा| जब तक संविधान का निर्माण नहीं करेंगा तब तक इंग्लैंड का राजा या रानी इनका हेड ऑफ़ द स्टेट्स रहेगा व् ये राज्यपाल और राष्ट्रपति की नियुक्ति नहीं कर पायेंगे| संविधान बनाने के बाद ये कामनवेल्थ डोमिनियन रिपब्लिक बन जायेंगे|
  4. भारत, पाकिस्तान व् अन्य विभाजित देश कामनवेल्थ के सदा सदस्य रहेंगे, इस कामनवेल्थ की अध्यक्ष ब्रिटिश राजा या रानी होंगे| इन सभी देशों के नागरिक सीधे-सीधे ब्रिटिश नागरिक रहेंगे तथा रिपब्लिक बनने के बाद भी क्राउन इनका अपरोक्ष हेड ऑफ़ द स्टेट रहेगा|
  5. कामनवेल्थ सेक्टेरिएट और कामनवेल्थ फेडरेशन के कानून इन देशों पर भी चलेंगे|

भारत में जल्द सत्ता हस्तांतरण के लिए और नेवी म्युटिनी जैसी घटनाएं रोकने के लिए तुरंत प्रभाव से वावेल को हटाकर माउंटबेटन को भारत का अंतिम गवर्नर बनाकर भेजा गया| ये माउंटबेटन साउथईस्ट एशिया कमांड के जनरल थे जिन्होंने जापानियों और आज़ाद हिन्द फौज का आत्मसमर्पण कबूला था|

१९४६ में जवाहरलाल नेहरु माउंटबेटन परिवार से सिंगापूर में मिल चुके थे| वहां नेहरु को नेताजी द्वारा बनाया गया, मगर अंग्रेजों द्वारा तोड़े गए पुनर्निर्मित वार मेमोरियल के उद्घाटन के लिए बुलाया गया था| मगर नेहरु इन माउंटबेटन की गाडी में बैठकर घूमते रहे और एडविना माउंटबेटन से नज़रें लड़ाते रहे, मेमोरियल तक गए ही नहीं|

दिल्ली पहुंचकर माउंटबेटन ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग से बात शुरू की| खुद ,माउंटबेटन को सौदेबाजी में सबसे कमजोर नेहरु लगे, मगर सबसे दृढ जिन्ना लगे| जिन्ना उनको सनकी लगते थे| डायरेक्ट एक्शन डे के बाद इन्टेरिम गवर्नमेंट से कांग्रेस बाहर निकल गयी थी और लीगियों ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली थी, इससे भी मुस्लिम लीग को बढ़त मिली|

आज़ादी देने की बात पर सबसे पहले वायसराय की अध्यक्षता में विभाजन समित बनी| इन धर्मों व् जातियों के आधार पर अलग-अलग पार्टियों को बुलाया गया-

  1. हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व के लिए कांग्रेस को चुना गया| कांग्रेस कहती रही कि वो सेक्युलर है और सभी धर्मों व् जातियों का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए वो पूरे देश का प्रतिनिधित्व करेगी| मगर वायसराय नहीं माना और उसने हिन्दुओं के प्रतिनिधित्व के लिए कांग्रेस को ही चुना व् हिन्दू महासभा के हिन्दुओं के नेतृत्व के प्रस्ताव को ठुकरा दिया|
  2. मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व मुस्लिम लीग व् स्पष्ट रूप से जिन्ना ने किया|
  3. द्रविड़ों के “द्राविड़ीस्तान” या “द्रविड़ नाडु” का नेतृत्व ई० वी० रामस्वामी उर्फ़ पेरियार (पहले जस्टिस पार्टी अब DMK) ने किया|
  4. सिक्खों के खालिस्तान के लिए अकाली दल की तरफ से सरदार बलदेव सिंह प्रस्तुत हुए|
  5. गुडगाँव से दिल्ली तक मेविस्तान के लिए भी दावे प्रस्तुत हुए जिनका समर्थन जिन्ना ने किया|
  6. दलितों के दलितिस्तान के लिए अम्बेडकर और जोगेंद्र मंडल को चुना गया|

सिखों की तरफ से अकाली दल ने एक भारत को चुनने तथा कांग्रेस के पाले में रहने का निर्णय किया| दलितों के दल दो विभाजन हुए, अम्बेडकर ने कांग्रेस के का समर्थन किया मगर जोगेंद्र मंडल भावी पाकिस्तान को दलितों का स्वर्ग बताने लगे| वायसराय ने द्राविड नाडु और मेविस्तान के प्रस्तावों को ठुकरा दिया| निर्णय हुआ कि पंजाब व् बंगाल का विभाजन होगा| चूँकि 2/3 हिस्सा भारत का होगा और 1/3 पाकिस्तान का तो सभी चल-अचल समपत्तियाँ इसी आधार पर बटेंगी| पाकिस्तान भारत को 100 करोड़ रुपये अचल सम्पतियों के देगा जिसके बदले भारत 55 करोड़ बतौर सहायता पाकिस्तान को देगा|

इस समिति की सिफारिशों के आधार पर 3 जून 1947 को आल इंडिया रडियो पर आज़ादी देना तथा भारत-पाकिस्तान विभाजन के बारे में बतायेगा| जनता को बताया गया कि बंगाल व् पंजाब के विभाजन होंगे| मगर कौन सा शहर कहाँ जाएगा किसी को नहीं पता था खुद नेहरु, पटेल, जिन्ना, और माउंटबेटन को भी नहीं|

देश को उम्मीद थी कि जिस तरह बंगभंग का आन्दोलन चलाकर पहले भी बंगाल विभाजन को रोक दिया गया था वही अब होगा, मगर अब के नेताओं में कुर्सी का लालच आ चुका था|

इसके बाद कांग्रेस के कोर कमिटी ने विभाजन को मंजूरी दी, कहते हैं कि इस बैठक में गांधी जार-जार बच्चों की तरह रोये थे| जुलाई 1947 में कोंसटीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में आल इंडिया कांग्रेस कमिटी में विभाजन के प्रस्ताव को पेश किया गया, फैसला इसके विपरीत जाता देख गाँधी को एनमौके पर हरिजन बस्ती से क्लब लाया गया| उनके आने बाद ही आल इंडिया कांग्रेस कमिटी ने विभाजन को स्वीकृती दी| यहीं पर पटेल को प्रधानमत्री बनाने के लिए 11 वोट व् आंबेडकर को 2 वोट मिले, मगर गांधी के कहने पर नेहरु को बतौर प्रधानमंत्री चुना गया|

माउंटबेटन ने सर रैडक्लिफ को लन्दन से बुलवाया और 45 डिग्री के तापमान वाली दिल्ली में उन्हें “राईस पेपर” पर पंजाब व् बंगाल के नक़्शे दिए गए| तपती गर्मी में उन्हें दिल्ली बैठकर इन पर 2/3 व् 1/3 के हिस्सों में प्रदेशों को बांटने के लिए कहा गया| रैडक्लिफ ने जब कहा कि उन्हें पता ही नहीं कि ये दोनों प्रदेश कैसे दिखते हैं, इनमें जनसँख्या किसकी ज्यादा है और किसकी कम, कौन कहाँ जाना जाता है ये भी नहीं पता तो वो विभाजन रेखा कैसे खींचेंगे| माउंटबेटन ने कहा कि यही बढ़िया कि आपको नहीं पता, अपना काम शुरू करो| तपती गर्मी में रैडक्लिफ ने नक्शों पर रेखाएं खींचनी शुरू करी| ध्यान रहे कि राईस पेपर बहुत पतला होता है, आम कागज़ से बहुत पतला, एक पानी की बूंद से ही फट जाता है| रैडक्लिफ के पसीने की बूंदें जार-जार राईसपेपर पर गिरती रही और उनकी पेन्सिल इधर से उधर चलती रही| काम पूरा होने के बाद रैडक्लिफ वापिस चले गए| उनके कागजों पर नेहरु, जिन्ना व् माउंटबेटन के हस्ताक्षर ले लन्दन भेज दिया गया|

प्रत्येक प्रोविंस (राज्य) की विधानसभा में पार्टीशन ऑफ़ इंडिया एक्ट पेश हुआ जिसे वहां कि अंतरिम प्रोविंशियल सरकारों ने पास किया| इनको पास करने वाली ज्यादातर सरकारें कांग्रेस की ही थीं| बंगाल में एक विचित्र प्रस्ताव कांग्रेस ने पेश किया कि  बंगाल पूरा एक ही रहना चाहिए चाहे वो भारत में जाए या पाकिस्तान में या अलग बांग्लादेश का निर्माण हो| इस प्रस्ताव को पास हो ही जाना था कि अचानक श्यामा प्रसाद मुख़र्जी ने इस प्रस्ताव को गिरवा दिया|

जहां कांग्रेस के नेता अपनी लाश पर विभाजन होने की बात कहते थे, आज वही कह रहे थे कि “सिर्फ रेखाएं कटी हैं, आप जहाँ हैं वहीँ रहें| सिर्फ सरकारें और देश बदलेगा बाकी कुछ नहीं|” मगर सच्चाई तो कुछ और ही थी| पंजाब और बंगाल में दंगे शुरू हो चुके थे| अफगान सीमा से लेकर पंजाब की तरफ जहां बलूच आर्मी के साथ मुस्लिम हिन्दुओं का गिन-गिनकर सफाया कर रहे थे, कमोबेश यही हाल बंगाल में भी था| अब के पंजाब वाले इलाके में आरएसएस का प्रभुत्व स्थापित था मगर मुस्लिम लीग को सरकारी व् अंग्रेजों का सरंस्क्षण प्राप्त था| लोगों ने पलायन शुरू कर दिया था|

गाँधी व् नेहरु का सपष्ट सन्देश-आदेश था कि जो जहाँ है वहीँ रहे व् इधर कोई ना आये| मगर लोग क्या करते? उन्हें इस बात की सजा मिल रही थी कि वो हिन्दू-सिख थे और मरते दम तक भारतीय बने रहना चाहते थे| भारत का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हो चुका था जिसमें सरकार और सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी यानी कांग्रेस सक्रिय नहीं थी| इसे लोग खुद चला रहे थे या आरएसएस के लोग नेतृत्व कर रहे थे|

गांधी ने जहां विभाजन को निश्चित मान लिया था वहीँ कांग्रेस इससे खुश थी| खुद नेहरु के शब्दों में, “हम थक चुके थे| 1942 से 1945 तक जेलों में रहने के बाद हममें और लड़ने की हिम्मत नहीं थी| हम सभी बूढ़े हो चुके थे और अब आराम करना चाहते थे| हममें पुनः जेल जाने की हिम्मत नहीं बची थी|” मतलब कांग्रेस की तलवार को जंग लग चुका था| विभाजन को अपनी लाश पर रोकने की इच्छा करने वाले आज सत्तासुख भोगना चाहते थे|

गांधी-नेहरु जहां हिन्दुओं को पाकिस्तान में मरते दम रहने और वहीँ मरने को कह रहे थे, वहीँ मुस्लिमों को हिंदुस्तान में ही रोक रहे थे| पंजाब और बंगाल को लोगों को मालूम ही नहीं था कब उनका इलाका भारत में जाएगा या पाकिस्तान में| 15 अगस्त से शुरू हुआ आज़ादी का जश्न कई हफ़्तों तक चला| आज़ादी के मशहूर भाषण “ट्रिस्ट विध डेस्टिनी” से लेकर 16 अगस्त को लाल किले पर ध्वजारोहण व् उसके बाद कई भाषणों में भी गांधी-नेहरु-पटेल या किसी कांग्रेसी नेता ने आज़ादी की लड़ाई में 1857 की क्रांति, आज़ाद हिन्द फौज, रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी, और सशस्त्र क्रान्ति का नाम तो छोडिये; विभाजन की विभीषिका झेल रहे लोगों के लिए एक सांत्वना का शब्द भी नहीं था|

कमाल है ना कि जहां कांग्रेस के नेता दिल्ली में और मुस्लिम लीग के लोग इस्लामाबाद में जश्न में डूबे थे वहीँ लाखों-करोड़ों लोग विभाजन की आग में जल रहे थे| उन्हें 20 अगस्त 1947 तक नहीं पता था कि उनका इलाका कौन से देश में चला गया है| 21 अगस्त 1947 से आल इंडिया रडियो और पाकिस्तान रेडियो पर शुरू हुआ घोषणाओं को दौर जो सिलसिलेवार बताता था कि फलाना इलाका हिंदुस्तान में है और फलाना पाकिस्तान में| जनवरी 1948 को कश्मीर युद्ध के बराबर ही ये विभाजन पूरा हुआ था| तब नेहरु और जिन्ना ने लाहौर में मिलकर कहा था कि दुनिया का सबसे बड़ा विभाजन 1 साल से कम समय में पूरा हुआ और वो भी शांतिपूर्वक| कैसी शान्ति? 10 लाख लोगों की लाशों के बाद फैले शमशान की शान्ति?

ध्यान रहे कि जब अंग्रेजों ने अमेरिका छोड़ा तो उसका बंटवारा अमेरिका और कनाडा के रूप में किया मगर तब नरसंहार न के बराबर हुआ था| जब अंग्रेजों ने इजराइल छोड़कर उसके बंटवारे की शर्त रखी तो इजराइल के नेता यूनाइटेड नेशंस को बीच में ले आये| 2 असफल कमेटियों के बाद यूनाइटेड नेशनस के अधीन तीसरी कमिटी बनी जिसने इजराइल जैसे छोटे से देश के विभाजन के लिए पूरे 3 साल लिए, उसके बाद जाकर दो अलग देश आज़ाद हुए|

जबकि 10 गुणा बड़े भारत भारत में मात्र 3 महीने में विभाजन हुआ मान लिया गया, इलाकों का बंटवारा 7 महीनों में हो गया जबकि देश पहले ही बने गए|

जिन रॉयल इंडियन नेवी के रेटिंग्स की बगावत की वजह से आज़ादी मिली और तथाकथित आज़ादी के बाद भी जेलों में बंद रहे, पता नहीं कब तक| उनके नाम क्या था, उनका धर्म क्या था, कोई नहीं जनता| उनको सैलरी, पेंशन और स्वतंत्रता सेनानी के स्टेटस की बात तो कौन करे, उनके बारे में भी कोई नहीं जानता| आज़ाद भारत में मात्र 5 किताबें ही इनके बारे में छपी जिनमे से 2 तो अब यूरोप में ही मिलती हैं, भारत में नहीं|

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