राष्ट्र गाँधी को सुन समझ न सका

“सुनना तो दूर मुझे तो कोई समझ भी ना सका” – मोहनदास गाँधी

प्यारेलाल लिखते हैं कि अंतिम दिनों में गाँधी कहा करते थे कि मेरी सुनता कौन है? यदि गाँधी जी अपनी इच्छा के अनुसार 125 वर्ष तक जीवित रहते तो अपनी उम्र के 124वें वर्ष में कहते कि सुनना तो दूर कोई समझ भी नहीं सका।

धुर विरोधी का गाँधी को समझना

मैं मोहनदास गाँधी का धूर विरोधी हूँ, इतना विरोधी कि उनको बापू या राष्ट्रपिता तो मानना दूर मैं उनको इस देश के विभाजन तथा अंध मुस्लिम तुष्टिकरण का दोषी मानता हूँ। गाँधी को आज़ादी का श्रेय देने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता क्योंकि देश गाँधी या उसकी अहिंसा ने नहीं बल्कि आज़ाद हिन्द फ़ौज़ और रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी 1946 ने आज़ाद करवाया था।
कांग्रेस ने मोहनदास गांधी की उन्हीं नीतियों का प्रचार किया तथा छात्रों को किताब में पढ़ाया जो उसके अनुकूल थीं।

गाँधी को समझें

यदि आपको सही अर्थों में गाँधी को समझना है तो मनु शर्मा द्वारा रचित “गाँधी लौटे” पढ़ें जो सही अर्थों में बताती है कि असल में गाँधी की सोच क्या थी और कांग्रेस ने कैसे उसे बदलकर अपनी गलतियों को गाँधी नाम के पीछे छुपाया और राष्ट्र की जनता बेवकूफ बनती गयी|

क्यूँ समझे गाँधी को?

मानता हूँ कि मोहनदास गाँधी की नीतियों के कारण हमेशा राष्ट्र का नुकसान हुआ है और कुछ देशप्रेमीजन शायद आज गाँधी के बारे में लिखा ये लेख पढकर प्रसन्न ना हों| परन्तु श्रीकृष्ण एवं विदुर जी का कहना है कि सज्जन व्यक्ति को किसी भी जीव से कुछ न कुछ अवश्य सीखना चाहिए| फिर मोहनदास गाँधी में कोई और खास बात हो ना हो मगर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उन्हें बापू बोलते थे एवं आज़ाद हिन्द रेडियो से 1945 के अपने प्रसारण में उन्होंने गाँधी को राष्ट्रपिता कहकर सम्बोधित किया था|

जब हमारे शास्त्रों के हिसाब से शत्रु को पूर्णतया समझना तथा हमें प्रत्येक जीव से कुछ न कुछ सीखना अनिवार्य है, तो क्यूँ ना मोहनदास कर्मचन्द गाँधी को एक बार समझने का प्रयत्न करें|

धर्मनिरपेक्षता और गाँधी

मोहनदास गाँधी ने हमेशा कहा था कि, “उन्हें धर्मविहीन (धर्मनिरपेक्ष) राष्ट्र नहीं चाहिए क्यूंकि वो धर्म ही है जो मनुष्य को पशुता से अलग करता है| चाहे कोई आदिवासी हो या गरीब हो, वो धर्म के धागों में ही पिरोकर अपने समाज का निर्माण करता है| जब धर्म ही नहीं रहेगा तो समाज निर्माण कर मनुष्य अपने को पशुता से अलग कैसे करेगा|”

अब क्या कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि उसने (यानि इनकी देवी इंदिरा नेहरु गाँधी ने) क्यूँ इस राष्ट्र को संविधान में संशोधन करके धर्मनिरपेक्ष घोषित किया जबकि इस कांग्रेस के अधिष्ठाता ऐसा चाहते ही नहीं थे?

आरक्षण और गाँधी

मोहनदास गाँधी ने एक बार हरिजन में पूना पैक्ट के बारे में लिखा था कि, “जब हम यात्रा कर रहे हों और साथ में यदि कोई विकलांग हो तो हमें उसे छोड़ने के बजाए कन्धों पर उठा कर यात्रा जारी रखनी चाहिए, चाहे हम पर बोझ ही क्यूँ ना बढ़ जाए| हाँ अगर विकलांग खुद चल पाने में, कुछ दुरी के बाद, सक्षम हो जाए तो हमें उसे अपने कंधे से उतारकर अपने साथ चलाना चाहिए| इसका मतलब यह हुआ कि आरक्षण उस समय तक दिया जाना चाहिए जब तक हरिजन मुख्यधारा के साथ ना जुड़ जाएँ|”

अब कांग्रेस को यह बताना चाहिए कि पिछड़ी जातियों को दिए गए आरक्षण की कोई समयावधि क्यूँ निश्चित नहीं की गयी? खुद को गांधीवादी और लोहियावादी मानने वाले लोगों को यह भी बताना चाहिए कि जब अतिरिक्त पिछड़ी जातियों को आरक्षण दिया गया तब उनके लिए भी समयावधि क्यूँ निश्चित नहीं की गयी| आरक्षण की समयावधि ना होने का तो अर्थ यह हुआ कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, तथा अन्य पिछड़ी जातियाँ अनादि काल तक कभी भी अगड़ी कही जाने वाली जातियों के साथ चलने के कभी लायक नहीं बनेगी| मोहनदास कर्मचन्द गाँधी की तो ये सोच ही नहीं थी|

हिंदी और गाँधी

मोहनदास गाँधी ने भले ही अंग्रेजी में शिक्षा ग्रहण करी तथा इसी भाषा में नौकरी करी परन्तु उन्होंने कभी भी अंग्रेजी को प्राथमिकता नहीं दी| उन्होंने अपनी आत्मकथा “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” गुजराती में लिखी जिसका महादेव देसी ने हिंदी में अनुवाद किया था| उनके जीते जी उन्होंने अपनी आत्मकथा का अनुवाद अंग्रेजी में नहीं किया| आज़ादी के बाद गाँधी ने कहा था कि ये संसद किस राष्ट्र की है जहां अंग्रेजी में भाषण हो रहा है| हिंदी को मातृभाषा बनाने की पुरजोर वकालत मोहनदास गाँधी ने की थी तथा खुद उन्होंने कांग्रेस अधिवेशन में हिंदी को मातृभाषा घोषित किया था| हिंदी को मातृभाषा बनाने के प्रस्ताव में अधिकांश वोट तथा समर्थन दक्षिण भारत के नेताओं से मिला था|

मगर अब कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि, “क्यूँ उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाकर इसमें सभी सरकारी काम अनिवार्य क्यूँ नहीं किये? क्यूँ हिंदी को मात्र राजकीय भाषा बनाया एवं अंग्रेजी के प्रयोग के लिए संविधान से क्यूँ दबाव बनाया?”

मनु शर्मा द्वारा रचित “गाँधी लौटे” में लेखक मनु शर्मा के शब्दों में गाँधी ने कहा है कि, “जब पाकिस्तान बना तो वहां के लोग ज्यादातर पंजाबी, पश्तो व् अन्य भाषाएँ बोलते थे, उर्दू बोलने वालों की संख्या बमुश्किल 5 प्रतिशत थी| मगर जिन्ना ने उर्दू को पाकिस्तान की राष्ट्रभाषा बना दिया, नतीजन आज वहां उर्दू बोलने वालों की संख्या ज्यादा है| अगर इस सरकार ने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाया होता तो मज़बूरी के द्वारा आज हर कोई हिंदी भाषी होता और हमें हिंदी दिवस मनाने की आवश्यकता नहीं होती|”

इसके आगे गाँधी बोलते हैं कि, “आज़ादी के बाद हमने हिंदी को पेट से जोड़ने के लिए कुछ नहीं किया बल्कि अंग्रेजी को कहीं ना कहीं हमने पेट से जुड़ना दिया|” शायद यही वजह है कि आज हिंदी बोलने वाले को नौकरी मिलनी में मुश्किल होती है या यूँ कहें कि हिन्दीभाषी को नौकरी मिलती ही नहीं|

गाँधी और राम

मोहनदास कर्मचंद गाँधी रामभक्त थे, इसमें कोई शंका नहीं है| माना कि उन्होंने पौराणिक रामधुन को बदल कर गाँधी-छाप धुन सिर्फ इसलिए बनाया था ताकि मुस्लिम एवं हिन्दुओं को एक सूत्र में पिरोया जा सके| मगर उस धुन में भी राम थे, उनके प्रति विश्वास था| अगर गाँधी जीवित होते तो राम मंदिर आन्दोलन को देखकर राम मंदिर बनवाने के लिए आमरण अनशन जरुर करते| गाँधी जिस रामराज्य को स्थापित करना चाहते थे, यदि श्रीरामजन्मभूमि को ठीक गाँधी के रामराज्य को दर्शाता हुआ बनाया जाए तो यह गाँधी के लिए सच्ची श्रद्धांजली होगी|

कुछ लोग कहते हैं कि गाँधी की आँखों में सोमनाथ खटकता था, मगर सत्यता यह है कि गाँधी सरकारी धन का प्रयोग किसी धार्मिक संस्था के निर्माण में नहीं लगवाना चाहते थे| सच्चाई यह है कि उन्होंने कभी सोमनाथ मंदिर के बनने का विरोध नहीं किया, अपितु विरोध किया तो उसके निर्माण में लगने वाले सरकारी धन का|

गाँधी और कांग्रेस

मोहनदास गाँधी को पता था कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर (सत्ता हस्तांतरण) अंग्रेजों से कांग्रेस को हुयी है अतःव आज़ादी के बाद कांग्रेस को ख़त्म कर नयी पार्टी बनानी पड़ेगी| चुनाव के बाद ही राष्ट्र के प्रधानमंत्री को चुना जाना चाहिए| मगर कांग्रेस कभी ख़त्म नहीं करी गयी|

गाँधी तुम महात्मा होते?

गाँधी तुम महात्मा होते यदि तुम

  1. मुस्लिम तुष्टिकरण में इतना ना बह जाते कि उन्हें खिलाफत से जोड़ते?
  2. मुस्लिम तुष्टिकरण में बह कर लखनऊ पैक्ट को ना मानते?
  3. हिन्दुओं के साथ-साथ मुस्लिमों की हिंसा की भी निंदा करते?
  4. मोपला और नोआखली दंगों की कड़ी निंदा करते?
  5. जवाहरलाल नेहरु की ममता में अंधे ना होते?
  6. गाँधी इरविन पैक्ट में सभी बंदियों के साथ-साथ भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, आदि क्रांतिकारियों को भी आज़ाद करवा लेते?
  7. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस तथा उनकी नीतियों का समर्थन करते?
  8. सुभाष चन्द्र बोस को 1939 में कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटने पर मजबूर ना करते?
  9. अंग्रेजों पर दबाव डालते जब वो विश्वयुद्ध में जर्मनी के आगे कमजोर पड़ रहा था?
  10. ब्रह्मचर्य के प्रयोग के नाम अश्लीलता ना करते?
  11. नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के संदेशों पर प्रतिक्रिया देकर आज़ाद हिन्द फौज के लिए समर्थन जुटा पूरे राष्ट्र को आसाम में एकत्रित कर आज़ाद हिन्द फौज का स्वागत करते?
  12. रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी 1946 के समय बगावती रेटिंग्स एवं अन्य सशस्त्र सेनाओं का सहयोग लेकर सशस्त्र क्रांति करते?
  13. विभाजन ना होते देते?
  14. विभाजन की विभीषिका से पीड़ित लोगों की पुनर्स्थापन करवाते एवं उनकी उपेक्षा ना करते?
  15. पाकिस्तान को 55 करोड़ देने के लिए अनशन ना कर पाकिस्तान से भारत के बकाया 300 करोड़ लेने के लिए अनशन करते?

उपसंहार

माना कि मोहनदास कर्मचन्द गाँधी महात्मा, राष्ट्रपिता एवं बापू नहीं थे; फिर भी उनमें इतना तेज था कि उन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता की लड़ाई में उनके योगदान से जनता पर काफी अनुकूल प्रभाव पड़ा था| हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जब मोहनदास कर्मचन्द गाँधी ने अपना कार्यक्रम शुरू किया था तब राष्ट्र में लोगों को लगता था कि, “पूर्वजन्म के कर्मों के कारण या सीता माता के वरदान से ये गोरे लोगों का राज आया है, जिससे हमें वो गुलामी मिली है जो मुगलों के काल से अच्छी है अतःव हमें आज़ादी के लिए कुछ भी नहीं करना चाहिए” | आज़ादी की लड़ाई में गाँधी के योगदान को भूला पाना नामुमकिन है|

टिपण्णी

Loading Facebook Comments ...
Loading Disqus Comments ...

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

 

No Trackbacks.