नेताजी के खिलाफ झूठे प्रचार का जवाब

सबसे पहली बात तो यह है कि पत्रकार या तथाकथित लेखक मणिमुग्ध शर्मा जी ने उन्हीं हथकंडों और प्रचार सामग्री का उपयोग किया है जिसका प्रयोग ब्रिटिश हुकूमत नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और उनकी आज़ाद हिन्द फ़ौज़ को बदनाम करने के लिए करती थी।

मगर जब आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के सैनिक ब्रितानिया सरकार के युद्धबंदी बनकर भारत पहुंचे और लाल किले की अदालत में उनपर मुकदमा चला तो सारी सच्चाई सामने आ गयी। खुद कभी नेताजी के विरोधी रहे वकील भूला भाई देसाई उनके बहुत बड़े प्रशंसक बन गए थे।

मणिमुग्ध एस शर्मा जी को आखिरकार नेताजी की याद तो आई! यह ब्लॉगपोस्ट उनकी ताज़ी खबर  http://navbharattimes.indiatimes.com/india/netaji-subhas-chandra-bose-wanted-ruthless-dictatorship-in-india-for-20-years/articleshow/46981633.cms का एक जवाब है।

 

 जब देश में सबको आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का सत्य और उसकी कामयाबी मालूम पड़ी तो ब्रिटिश रॉयल आर्मी, रॉयल इंडियन नेवी और रॉयल एयरफोर्स में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत फ़ैल गयी जिसका नतीजा था 1946 की रॉयल इंडियन नेवी म्युटिनी जिसमें 13 जंगी जहाजों ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया था।
आज फिर वही ब्रिटिश प्रोपेगंडा का प्रयोग कर क्या मणिमुग्ध शर्मा अंग्रेज़ों के प्रति अपनी वफ़ादारी का प्रयोग कर रहे हैं?
आरोप – नेताजी ने 1935 में रोम की यात्रा की थी, ताकि अपनी किताब की कॉपी इटली के तानाशाह मुसोलिनी को भेंट कर सकें। नेताजी उसे बहुत पसंद करते थे और उसके ‘आदर्शों’ पर आजीवन चलना चाहते थे।
जवाब – नेताजी सुभाष चन्द्र बोस एक बहुत बड़े बुद्धिजीवी और देशभक्त थे। यूरोप में रहते हुए उन्होंने ना सिर्फ अपनी बीमारी का इलाज किया बल्कि प्रथम विश्व युद्ध के समापन पर हुई 1919 की ट्रीटी ऑफ़ वरसाइल के बाद के यूरोप के बारे में स्वयं जानना चाहते थे। उनकी बीमारी के दौरान ही इंग्लैंड के एक प्रकाशन संस्थान विशार्ट एंड कंपनी ने उन्हें भारत में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के बारे में अपने अनुभव संकलित कर एक पुस्तक लिखने के लिए। सुभाष चन्द्र बोस ने इसे स्वीकार किया और “इंडियन स्ट्रगल 1920-34” लिखी। इस पुस्तक को टाइप करवाने के लिए उन्होंने एमिली शेंकल को टाइपिस्ट नियुक्त किया। बुक इंग्लैंड में छपी और तुरंत मशहूर हो गयी। इस पुस्तक में भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का पूर्ण ब्यौरा था। स्वयं तत्कालीन राजनैतिकविद रोमन रोल्लांड को यह पुस्तक बहुत पसंद आई थी और उन्होंने इसे एक ईमानदार लेखन बताया था। बताते चलें कि यह पुस्तक भारत में बैन हो गयी थी परन्तु यूरोप में मौजूद हर देश के राजनीतिज्ञों ने यह पुस्तक पढ़ी और बहुत पसंद करी थी।
यूरोप उस समय इलाज़ के लिए बहुत बड़ा केंद्र बना हुआ था। भारत में किसी भी बड़ी बीमारी के लिए पश्चिमी सभ्यता के डॉक्टर सीधे विएना, स्विट्जरलैंड और रोम के ब्लैक फारेस्ट जाने की सलाह देते थे। चिकित्स्कीय पर्यटन (मेडिकल टूरिज्म) भी रोम जाए बिना पूरा नहीं होता था। और जब एक भारतीय राजनीतिज्ञ रोम जायेगा तो मुसोलिनी की पार्टी का उससे मिलना स्वभाविक था क्यूंकि मुसोलिनी भारत के स्व्तंत्रता संग्राम का समर्थक था और ब्रिटिश हुकूमत का शत्रुप्राय। मोहम्मद इक़बाल शैदाई और सरदार अजित सिंह के साथ कई अन्य भारतीय क्रांतिकारियों को मुसोलिनी ने शरण दी थी। ठीक इसके विपरीत जर्मनी अपने ब्रिटिश-समर्थक विचारधारा के कारण कभी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का समर्थक नहीं रहा था। यह भी उल्लेखनीय है कि वीर सावरकर जैसे बहुत से भारतीय क्रन्तिकारी एवं नेतागण इटेलियन क्रांति से प्रभावित थे। अतएव जब सुभाष चन्द्र बोस 1934 में अपने इलाज़ के लिए ब्लैक फारेस्ट गए थे तब वहां उनका संपर्क इटालियन नेताओं से होना स्वभाविक था। बाद में उनके यही इटालियन संपर्क भारत से बनवास में निकालकर जर्मनी जाने के काम आए।
सुभाष चन्द्र बोस की 1934 में हिटलर से कोई मुलाकात नहीं हुयी। बोस इटली और जर्मनी के फासीवाद के ना तो समर्थक थे और ना ही प्रशंसक। अपितु उन्होंने रशिया के कम्युनिज्म और इटली एवं जर्मनी के फासीवाद को मिलाकर एक नयी विचारधारा के जन्म एवं समर्थन की बात कही थी।  नेताजी मुसोलिनी के मात्र प्रशंसक थे क्यूंकि वो यूरोप का एक प्रभावशाली शासक होने के बावजूद भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सहयोग करता था। परन्तु कभी नेताजी ने उसके क़दमों पर चलने की बात नहीं कही थी। इसके अलावा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस और वीर दामोदर सावरकर दोनों ही गिउसेप्पे गैरीबाल्डी और मैज़िनी के प्रशंसक थे।
आरोप – उन्होंने अपने आप ही हेड ऑफ स्टेट यानी प्राइम मिनिस्टर, युद्ध मंत्री और विदेश मंत्री की उपाधियां दे दीं।
जवाब – जब खुद इंडिया इंडिपेंडेंस लीग के अध्यक्ष रास बिहारी बोस ने लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ का सम्पूर्ण नेतृत्व नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को दिया था, तब और कौन उन्हें क्या उपाधि देता? जापानी सरकार और  इंडिया इंडपेंडेन्स लीग के बीच में ही सारी कार्यवाही होती थी, परन्तु लीग को सरकार का दर्जा हासिल नहीं था। इसलिए नेताजी ने इंडिया  इंडिपेंडेंस लीग के अधीन ही आज़ाद हिन्द सरकार (प्रोविजनल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया) का गठन किया था। जब पितृ संस्थान के अधिष्ठाता नेताजी थे तो पुत्र संस्थान के अधिष्ठाता वो क्यों नहीं होंगे? इसके अलावा खुद रास बिहारी बोस ने इस बात का अनुमोदन किया था कि नेताजी ही दक्षिण-पूर्व एशिया में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एकमात्र व् सर्वमान्य आधिकारिक नेता होंगे। स्वयं रास बिहारी बोस ने आज़ाद हिन्द सरकार के गठन की पूर्व संध्या पर सूचि देखकर अपना अनुमोदन दिया था कि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ही नवीन सरकार के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, युद्धमंत्री एवं विदेश मंत्री होंगे। उस समय नेताजी सुभाष चन्द्र बोस को छोड़कर और कोई बड़े दर्जे का राजनीतिज्ञ वहां नहीं था।
आरोप –  वह चाहते थे कि भारत आजाद हो, तो पहली वाली उपाधि उनके पास रहे।
जवाब – रास बिहारी बोस ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग का गठन किया था जो जापान सरकार पर निर्भर थी। प्रथम आज़ाद हिन्द फ़ौज़ के नाकामयाब होने के बाद रास बिहारी बोस ने जापान सरकार को नेताजी को जर्मनी से तुरंत लाने को कहा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आगमन पर तुरंत प्रभाव से रास बिहारी बोस ने इंडिया इंडिपेंडेंस लीग और आज़ाद हिन्द फ़ौज़ की जिम्मेवारी उन्हें सौंप दी थी। क्यूंकि लीग जापान सरकार पर निर्भर थी, इसलिए नेताजी ने बराबरी के लिए आज़ाद हिन्द सरकार का गठन किया था जिसमें आज़ाद हिन्द फ़ौज़ उनकी आर्मी थी जिसमें थल, जल और वायु तीनों टुकड़ियां उसके बाद लगाई गयी थी। आज़ाद हिन्द सरकार के पास एक बैंक भी था – आज़ाद हिन्द बैंक, जिसमें सभी भारतीयों से एकत्रित कर और दान रखा जाता था। सरकार के गठन के बाद जापान से सारी वित्तीय सहायता बैंक द्वारा कर्जे पर ली जाती थी। आज़ाद हिन्द सरकार के प्रतिनिधि के पास जापान सरकार से समझोते करने के लिए पद हो इसके लिए नेताजी को राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री की पदवी लेनी पड़ी।
ध्यान रहे इससे पहले राजा महेंद्र प्रताप ने काबुल में 1915 में फर्स्ट प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ फ्री इंडिया की स्थापना की थी। ऐसे प्रोविज़नल सरकारों की स्थापना किसी देश की आज़ादी से पहले क्रांतिकारियों द्वारा की जाती हैं ताकि उनका जीते हुए सीमा क्षेत्र में सरकारी व्यवस्था हो और विदेशों से आधिकारिक रूप से मदद ली जा सके। निकट इतिहास में शेख मुजिबर रहमान ने कलकत्ता में प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ बांग्लादेश बनाई थी, जिसने बांग्लादेश बनने के बाद में अपनी सरकार बांग्लादेश में स्थानांतरित कर ली थी। ध्यान रहे – भारत सरकार और प्रोविज़नल गवर्नमेंट ऑफ़ बांग्लादेश के समझोते के बाद ही भारत पाकिस्तान पर हमला कर बांग्लादेश को आज़ाद करवाने के लिए अधिकृत हुआ था। यदि मुज़बीर रहमान इस प्रोविज़नल सरकार का प्रधानमंत्री नहीं होता तो वो इंदिरा गांधी (तत्कालीन प्रधानमंत्री) से अपने देश को आज़ाद करवाने के लिए आधिकारिक समझौता नहीं कर सकता था।

टिपण्णी

Loading Facebook Comments ...
Loading Disqus Comments ...

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

 

No Trackbacks.