आरएसएस बनाम कांग्रेस

आरएसएस बनाम कांग्रेस का जब मूल्यांकन करते हैं तो पाते हैं कि जहां कांग्रेस की स्थापना अंग्रेजों में एक सेवानिर्वित ए0 ओ0 ह्युम ने जनता में ब्रिटिश सरकार के प्रति सहानुभूति जगाने के लिए करी थी वहीँ आरएसएस की स्थापना डॉक्टर केशव राव बलिराम हेडगेवार ने पूर्णतया राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की विचारधारा को बल देने के लिए करी थी| जहां आरएसएस के लिए वीर विनायक दामोदर सावरकर शीर्ष नेता थे वहीँ कांग्रेस अपनी सारी नाकामियाँ मोहनदस करमचंद गाँधी के पीछे छुपाया करती थी|

जानना चाहते हैं ना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तो सुनो –

मोहन दास गांधी के भारत छोडो आंदोलन को अंग्रेज़ों ने आधे दिन में दबा दिया था, अरुणा आसफ अली को छोड़कर कोई भी नेता ऊपर शीर्ष नेतृत्व से लेकर निचे कार्यकर्ताओं तक 1942 से 1945 तक जेल में थे। कांग्रेस के सभी ऑफिस, कांग्रेस के खाते, और यहां तक कि कांग्रेस या गांधी का नाम लेनेवाला तक जेल में था। तब किसने भारत में 1942 से 1945 तक सशस्त्र क्रान्ति करी? कौन इन्हें लीड करता था? जिस दिन ये सच बाहर आ गया उस दिन आपको बहस करने की आवयश्यता नहीं पड़ेगी। अरुणा आसफ अली खुद लिखती हैं कि उन्हें रोजाना 30 से 50 लोग ये पूछने के लिए मिलते हैं कि, “कहाँ बम्ब फोड़ना है, जब पूछती हूँ कि बम्ब बनाना या फोड़ना आता है तो वो कहते हैं कि पूरी ट्रेनिंग मिली है। माना कि आज़ाद हिन्द रेडियो से प्रसारण आता है मगर स्थानीय तौर पर इन्हें प्रशिक्षण कौन दे रहा है?”

ध्यान रहे अरुणा आसफ अली महराष्ट्र में ही सक्रिय रही और यहीं आरएसएस और हिन्दू महासभा भी कार्यरत थीं।

मोहनदास गांधी की तानाशाही थी उस कांग्रेस पर जिसने पहले तो अंतरिम सरकार बनाई 1946 में फिर 1947 में। कैसे बनाई – किंग जॉर्ज पंचम के प्रति वफ़ादारी की शपथ लेकर जबकि नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने ICS की नौकरी छोड़ दी थी ताकि ये शपथ ना लेनी पड़े। 1947 की सरकार का मंत्रिमंडल और राष्ट्रपति सब गांधी ने चुने थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस चिल्लाते रह गए कि सेना लेकर आसाम तक आ जाऊंगा आगे आप रास्ता साफ़ करो मगर गांधी और नेहरू तो अहिंसा का राग अलाप रहे थे। जब 1946 में रॉयल इंडियन नेवी की क्रान्ति हुयी जिसे अंग्रेज़ों नें म्युटिनी यानी सैनिक बगावत कहा, तब भी 20000  सैलर्स रेटिंग्स ने खुलेआम तथा रॉयल इंडियन एयरफोर्स एवं रॉयल इंडियन आर्मी की दो रेजीमेंट्स ने गुप्त सन्देश दिया कांग्रेस को कि आओ बगावत को रास्ता दिखाओ हम पूरा देश बिना विभाजन तुम्हें सौंप देंगे मगर देश में मौजूद एक भी गाँधीवादी तैयार नहीं था। कांग्रेस की अरुणा आसफ अली और हिन्दू महासभा एवं महासभा के नेता एन बी खरे को छोड़कर किसी ने रॉयल इंडियन नेवी क्रान्ति का साथ नहीं दिया।

अंग्रेज़ों ने कांग्रेस और मुस्लिम लीग को कहा कि रॉयल इंडियन नेवी की बगावत को शांत कराओ बदले में देश का विभाजन तथा डोमिनियन स्टेटस के द्वारा आज़ादी दे देंगे।

क्रन्तिकारी सैनिकों ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं से नेतृत्व माँगा था अपनी क्रांति का, मगर नेहरू पटेल ने उन्हें हथियार डालकर सरेंडर करने को कहा और कहा कि किसी भी देश को उसकी सेना की बगावत पसंद नहीं इसलिए अंग्रेज़ों को भी तुम पसंद नहीं।

कांग्रेस को जीती हुयी आज़ादी के बदले में भीख में मिली कमतर आज़ादी और विभाजन मंजूर था सो वही हुआ।

चलो विभाजन हुआ, सारे कांग्रेसी दिल्ली थे किसलिए? भाई विभाजन हो रहा है, दंगे भड़क रहे हैं सम्भालो जाकर। कांग्रेस की सरकार ने हाथ खड़े कर दिए माउंटबेटन के सामने कि हम देश नहीं चला सकते आप वायसराय के रुप में काम जारी रखिये?

विभाजन को रोकना तो दूर विभाजन की विभीषिका को कम करने के लिए कुछ नहीं था कांग्रेस के पास। ये लोग तो इतने गिरे हुए थे कि दुनिया में सबसे बड़े विभाजन के लिए 2 साल तो लेना दूर 2 महीने भी पुरे नहीं दिए। माउंटबेटन ने जबरदस्ती 15 अगस्त को आज़ादी सौंप दी जबकि विभाजन की विशालता के हिसाब से कम से कम 2 साल चाहिए थे ताकि कत्लेआम कम हो और पुनर्स्थापना अच्छा एवं शांतिपूर्ण हो। जहां इजराइल और फिलिस्तीन के विभाजन को 3 साल मिले वहीँ 3 जून 1947 को भारत पाकिस्तान का विभाजन घोषित किया गया और मात्र तीन महीने यानी 15 अगस्त 1947 तक का ही समय मिला। वाह रे कांग्रेस और कोंग्रेसी

क्या कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि इजराइल में कोई गांधी नहीं था कोई कांग्रेस नहीं थी फिर भी वो क्यों आज़ाद हुआ और क्यों एक छोटे से देश को विभाजन के लिए पुरे 3 साल मिले और विभाजन हुआ सयुंक्त राष्ट्र संघ की न निगरानी में? जबकि ऐसा भारत के साथ क्यूँ नहीं हुआ?

क्या कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि जब 3 जुलाई 1947 को विभाजन का प्रस्ताव पास हो चुका था तब उसने दिल्ली के कोंस्टीटूशनल क्लब में क्यों विभाजन का प्रस्ताव पास कर उसे माना और ये भी कहा कि 3 महीने विभाजन के लिए बहुत हैं? क्यों कांग्रेस ने ज्यादा समय विभाजन के लिए नहीं माँगा?

क्या कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि बंगाल विधानसभा में पूर्ण बंगाल (पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश) को एक रख अलग देश बनाने का प्रस्ताव क्यों रखा गया? अगर श्यामा प्रसाद मुख़र्जी इसका विरोध नहीं करते तो ये विधेयक पास हो जाना था|

विभाजन को कंट्रोल करने के नाम पर भारत पाकिस्तान के बीच जा रहे विस्थापितों को आसमान से सिर्फ डबलरोटी के पैकेट फेंके जाते थे। जो पंजाबी, सिंधी, या कोई और पाकिस्तान से भारत आ गया, उसके लिए कुछ नहीं । अमृतसर स्टेशन से लेकर दिल्ली, गुजरात से लेकर मुंबई तक हर जगह कांग्रेस सरकार नदारद थी इन विस्थापितों की मदद करने के लिए। सिर्फ आरएसएस और हिन्दू महासभा ने ही इनको रोटियां दी और आसरा दिया। आर्मी के साथ आरएसएस ही लगी रहती थी विस्थापितों का रजिस्ट्रेशन करवाने तथा उनके रिश्तेदारों को ढूंढने में।

क्या कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि जब धर्म के आधार पर विभाजन हो रहा था और सारे के सारे शत-प्रतिशत मुस्लिम जाने को तैयार थे तो उन्हें क्यों रोक गया? चलो रोका, बढ़िया है क्यूंकि भारत विभिन्नताओं वाला देश है कोई बात नहीं। मगर पाकिस्तान में रह रहे हिन्दुओं को सम्पूर्ण संख्या में क्यों भारत नहीं लाया गया क्यूंकि पाकिस्तान तो बन ही सिर्फ मुस्लिम के लिए रहा था वहां गैर-मुस्लिम के लिए जगह ही नहीं थी, क्यों उन्हें रोक गया? पाकिस्तान ने सभी हिन्दू हरिजनों यानी सफाईकर्मियों को आने से रोका था जबकि वो भारत जाना चाहते थे| उन्हें जबरदस्ती मुस्लिम बनाया गया था, कांग्रेस सरकार ने तब उन्हें बचाने के लिए क्या उपाय किये थे? और आज के जमाने में इन्हीं हरिजनों को आरक्षण की डुगडुगी पकड़ा दी|

व्यवस्था छोड़िये हिन्दू विस्थापितों से दो बोल बोलने कि बजाए गांधी कहता था कि, “तुम लोग यहां क्यों वहीँ क्यों नहीं रह गए, यहां क्या करने आये हो? ये तुम्हारा देश नहीं है, तुम्हारा देश तुम वहीँ छोड़ आये हो?…………वो मुस्लिम बनाते तो बन जाते, वो मारते तो मर जाते, विरोध क्यों किया?” हिन्दू औरतों से बलात्कार की खबर मिलने पर कहते, “मुस्लिम अपने ही भाई है, हम क्या कर सकते हैं?” अपने घर की इज्जत लूटी जाए, हम क्या कर सकते हैं?

गांधी ने जिन मुसलमानों को जाने से रोका था पुराने किले में, सिर्फ उन लोगों के लिए पुनर्वास आयोग बनाया गया था। इस पुनर्वास आयोग से गांधी के जिन्दा रहने तक किसी भी हिन्दू विस्थापित को एक इंच जमीन और एक पैसे की मदद भी नहीं मिली थी।

जहां एक तरफ पाकिस्तान कश्मीर कब्जाने के लिए ऑपरेशन चला रहा था वहीँ गांधीं अनशन कर रहा था कि पाकिस्तान को 55 करोड़ दो। पटेल और नेहरू को ब्लैकमेल कर पैसे दिलवाए गए नहीं तो गांधी ने अनशन से ही मर जाना था। पैसे मिलते ही पाकिस्तानी आर्मी कश्मीर में पहुँच गयी।

चलो दिए बुजुर्ग हठ के कारण, मगर पाकिस्तान की तरफ बकाया 300 करोड़ रुपये क्यूँ नहीं वसूले गए? क्या बतायेंगे कांग्रेसी ये कि इन्हें क्यूँ छोड़ दिया गया? 55 करोड़ देने के बजाय 300 करोड़ में से 55 करोड़ घटाकर कह  सकते थे कि बाकि के 245 करोड़ देने की मांग रखते| दुनिया में ढोल पिटते कि 55 करोड़ का कर्ज माफ़ कर दिया बाकी 10 करोड़ हर साल लेंगे| मगर नहीं, गांधी का हठ था ना|

वहीँ आरएसएस की 2000 से ऊपर कश्मीर की शाखाओं में एक नया ही आंदोलन फूट पड़ा था। पाकिस्तान आर्मी के आने के बाद राजा हरी सिंह कि डोगरा आर्मी के लगभग सभी मुस्लिम सैनिकों (शायद कुछ अपवाद हों) ने बगावत कर दी थी और पाकिस्तान की आर्मी से जा मिले थे अपने धर्म के जिहाद को बढ़ावा देने के लिए। मुस्लिम सैनिकों के एक दल का नेतृत्व शेख अब्दुल्ला कर रहे थे जिनका साथ दे रहे थे नेहरू जिन्होंने शेख अब्दुल्ला के लिए हथियारों से भरे 5 ट्रैक कश्मीर भेजे थे। पाकिस्तान का मकसद था जम्मू कश्मीर को भारत से अलग करना तथा खुद में मिलाना, शेख अब्दुल्लाह का मकसद कश्मीर को आज़ाद राष्ट्र (भारत पाकिस्तान से) अलग घोषित करना। उस समय कश्मीर में आरएसएस की 2000 शाखाएं थी, डोगरा आर्मी के हिन्दू कमांडर्स ने आरएसएस को टिप दी जिसके बदले में आरएसएस ने हथियारों से भरे ट्रक लूट लिए। इसका सबूत हैं नेहरू और पटेल के बीच एक ही दिन में हुए 4 से ज्यादा पत्र। अब आरएसएस ने इन हथियारों के साथ जम्मू कश्मीर में 10 दिन तक डोगरा आर्मी के साथ लड़ाई लड़ी। शेख अब्दुल्ला को उसी के घर में गुरु गोलवलकर ने तगड़ी पटकखनी दी थी।

गांधी ने इसी समय दूसरा अनशन करने का निर्णय किया जिसका मकसद था कि भारत सरकार अपने पैसे से अपनी जमीन पर 10 किलोमीटर चौड़ी पश्चिमी पाकिस्तान (अब पाकिस्तान) से पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) तक सड़क बनवाकर दे जो ग्रैंड ट्रक रोड के समानांतर हो और जिसपर पाकिस्तान का हक हो। Jad Adams ने अपनी पुस्तक “Gandhi Naked Ambition” ने इसका उल्लेख किया है। इसी का उल्लेख नत्थूराम गोडसे ने अपने ब्यान और जीवनलाल कपूर कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में किया था।

क्या कांग्रेस ये बताने का कष्ट करेगी कि पाकिस्तान से लूट पिट के आये हिन्दू लोगों के लिए पुनर्वास आयोग की योजना गांधी के मरने के बाद ही क्यों लागू की गयी जबकि गांधी के जीते-जी गांधी द्वारा रोके गए मुस्लिमों को पुनर्वास आयोग से ना सिर्फ मस्जिदें बल्कि मकान और दुकाने भी मिली?

जिस कांग्रेस ने स्वराज्य पार्टी से लेकर जनसंघ को ख़त्म करने में कसर नहीं छोड़ी अगर उसके पास आरएसएस के खिलाफ गांधी हत्या में एक भी सबूत होता तो आज आरएसएस का नामोनिशान ही नहीं होता। सच तो यह है कि मोहनदास गांधी को मारने की योजना सिर्फ और सिर्फ नत्थूराम गोडसे की थी तभी गोलवलकर ने उसे एक विकृत मानसिकता का इंसान बताया था।

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