चरखा और नरेन्द्र मोदी

ढाका की मलमल के बारे में आप सभी ने सुना होगा | कहते हैं कि आप ढाका की मलमल वाली चादर को एक अंगूठी से निकाल सकते थे | इतनी बारीक़ और महीन होती थी ये | यही कहानिया कमोबेश भारत के हर हिस्से की हैं | हमने एसा लोहा बनाया जिसपे हजारों सालों से जंग नहीं लगी | पर ये सब हवा में नहीं हुआ | इसे करने में हमारे पूर्वजों की दिन रात की मेहनत और ज्ञान था |

फिर अंग्रेज आये | अपनी रिपोर्ट में वायसराय ने लिखा “ मैं हैरान हूँ भारत को देखकर | यहाँ कोई गरीब नहीं | सब व्यापारी है, किसान हैं | सबके अपने काम धंधे हैं | सबके यहाँ स्वर्ण भंडार हैं | मैं यहाँ इतने दिनों से हूँ | मैंने किसी को भीख मांगते नहीं देखा | सिवाय साधू सन्यासियों के | पर वो समाज के हित में मांगते हैं | अपने लिए नहीं | ये हैरत की बात है ” ये था इंग्लॅण्ड के भारत में तत्कालीन वायसराय के शब्दों में हमारा भारत | नाम नहीं लिख रहा हूँ | गूगल कीजियेगा |

धन- धान्य और तमाम तरह के खनिजों से परिपूर्ण सोने की चिड़िया कहे जाने वाली इस भारत भूमि को लूटने के नए नए तरीके खोजे जाने लगे | तमाम मीटिंग्स हुई | निष्कर्ष निकाले गए | निर्णय लिए गए | चूंकि तब तक अंग्रेज भारतवर्ष के भाग्य विधाता बन चुके थे सो उनके लिए गए निर्णय भारत का भविष्य थे | उन लिए गए निर्णयों में से एक था भारत के हथकरघा उद्योग को बर्बाद करने का निर्णय | आधुनिकीकरण के नाम पर तमाम छोटी छोटी ग्रामोद्योग इकाइयों को बंद करा दिया गया |

भारत भर से कपास ढाका की जगह लन्दन जाने लगी | वहां से मशीन का बुना सस्ता और घटिया कपडा आने लगा | चूंकि ये कपडा बहुत ही सस्ता और दिखने में आकर्षक था | सो हमारे भारतीय भाइयों ने इसे हाथों- हाथ लिया | धीरे- धीरे बुनकरों के घर में फांका पड़ना शुरू हुआ | उन्हें दो जून की रोटी भी बमुश्किल नसीब होने लगी | मजबूरन उन्हें अपने पूर्वजों के हुनर, जो पीढ़ी दर पीढ़ी उनके हाथों में रचा बसा था, उसे तिलांजलि देनी पड़ी |

आप सोच रहे होंगे मैं इसे क्यों सुना रहा हूँ ? बताता हूँ | आज आपको बहुत से तथ्य पता चलेंगे | लेख थोडा लम्बा हो जायेगा अत: आपसे धैर्य से पूरा पढने की गुजारिश कर रहा हूँ |

अभी हाल ही में मोदी जी खादी ग्रामोद्योग की डायरी और केलेंडर पर सूत कातते नजर आये | ये डायरी और केलेंडर हर साल छपते हैं | इसमें कुछ नया नहीं है | पर इस बार फ्रंट पेज पर गाँधी जी की नहीं बल्कि आज के आइकोन भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर थी | बस यही विवाद की जड़ है | हालाँकि ये प्रथम बार नहीं है जब फ्रंट पेजेस पर गाँधी जी नदारद हैं | विगत वर्षों में कई बार एसा हुआ है | पर चूंकि इस बार केंद्र में मोदी जी हैं तो विवाद उठना लाजमी है |

हिम्मत कैसे हुई संघ के एक स्वयंसेवक की गाँधी को रिप्लेस करने की ? माना आपको अपार जनसमर्थन प्राप्त है | पर कुछ मामले ऐसे हैं जहाँ लकीर पीटना अनिवार्य है | कहते भी है “ मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी |” और आपने साहब उन्ही गाँधी को रिप्लेस कर दिया | ऐसे में वो लोग जिनकी रोजी रोटी गाँधी नाम से चलती है, भला वो कैसे चुप रह सकते हैं ? माना आपके विचारों से प्रेरित हो आज का युवा खादी खरीदने लगा है | आकंड़ो को अगर देख लें तो खादी की बिक्री के आकंडे की सुई जो विगत बीस वर्षो 5-6 % की बढ़ोतरी पर टिकी हुई थी | आज आपके शासन काल में वही सुई मीटर फाड़ के 34% का ग्रोथ दिखाती है |

क्या जरूरत है साहब आपको खादी की फिकर करने की ? काहे नहीं उन कुकुरमुत्तों को चैन से उगने और फलने फूलने देते आप ? पड़ा रहने दीजिये चरखे को इक कौने में | लगने दीजिये उसे धूल-धक्कड़ | बाकी नेताओ की तरह आप भी बापू के जन्मदिन पे जाइए आश्रम में | चढ़ा आइये 2 फूल उस चरखे की मैय्यत पर | जब आज तक यही होता आया है तो वही होने दीजिये न | आप काहे चरखे को अपने अंगोछे से पोछ अपने हाथ ख़राब करते हैं ? मरने दीजिये उन बुनकरों के सपनों को, फटने दीजिये उस मलमल की चादर को जो कभी अंगूठी से पार हो जाया करती थी | पहले अंग्रेजों ने उन्हें लूटा, अब चरखे की आड़ में गाँधी के वंशज लूटेंगे | आपको क्या ?

साहब हम भारतीय इसी लायक हैं | 1200 सालों की गुलामी हमने युही नहीं झेली | आपका विरोध तार्किक आधार पर नहीं है | ये हो भी नहीं सकता | क्युकि गाँधी को बेचने वाले तर्क की कसौटी पर कहीं खरे नहीं उतरते | चूंकि बात अब लेगेसी की हो रही है | तो गाँधी जी की लेगेसी और वर्तमान पर विमर्श करना और उसे आप तक पहुँचाना हमारा परम कर्तव्य है | दो ट्वीट पेशे- खिदमत हैं |

1. “Since it’s happy women day today. Men should be allowed to touch them to feel happiness.”
2. “I love to watch women playing at Wimbledon. The trouble is I keep watching the wrong balls.”

मेरे हिंदी पाठकों के लिए मैं हिंदी अनुवाद लिख रहा हूँ |
1. “चूंकि आज महिला दिवस है इसीलिए आज पुरुषों को उन्हें छूकर खुश होने की स्वतंत्रता होनी चाहिए |”
2. “मुझे महिलाओं को विम्बलडन में खेलते देखना पसंद है |” माफ़ कीजिये इससे आगे का अनुवाद मैं नहीं लिख सकता | बस इतना समझ लीजिये कि आगे जो कहा गया है वो बहुत ही बदतमीज़ और घटिया मानसिकता को दर्शाता है | एक सभ्य परिवार से आने वाला कभी एसा नहीं कह सकता |

हाँ ये मेरे ट्वीट नहीं हैं | मैं संघ का स्वयंसेवक हूँ | मुझे शाखाओं में “यत्र नारीयस्तु पूज्यते” का पाठ पढाया गया है | मैं वीर शिवाजी की उस परंपरा का वाहक हूँ जिसने विजित गौहर खान में अपनी माँ का अक्स देख उन्हें ससम्मान पालकी में बैठाकर उनके शिविरों में वापस भेजा था । ये उदगार हैं महान महात्मा गाँधी जी के प्रपोत्र तुषार गाँधी के | जिन्हें आपने कल टीवी पर कलपते देखा होगा | कल उन्होंने कहा कि “बापू अब KVIC को राम-राम कह दें. यूं भी KVIC ने खादी और बापू दोनों की विरासत को कमजोर ही किया है. लिहाजा मोदी को चाहिए कि वो इस कमीशन को निरस्त कर दें |”

इन महानुभाव ने विरासत चुराने की बात की है | मैं यहाँ इन्हें गाँधी जी की सुशीला बेन और मनु बेन को अपने बिस्तर पर सुलाने वाली विरासत से नहीं जोड़ रहा | यद्यपि ऊपर लिखे 2 ट्वीट से ये स्पष्ट है कि ये किस विरासत की बात कर रहे हैं | फिर भी मैं इनका ध्यान कुछ एतिहासिक तथ्यों की तरह खींचना चाहूँगा |

1. भारत के इतिहास में पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले वीर सावरकर प्रथम व्यक्ति थे | उन्होंने सन 1900 में पूर्ण राजनैतिक स्वतंत्रता की बात की | उस समय तक कांग्रेस के अधिवेशनों में उनकी अंग्रेजों के प्रति भक्ति प्रकट करने के लिए “लॉन्ग लिव द किंग” गाया जाता था | बाद में वीर सावरकर से प्रभावित हो यही मांग आज़ाद भगत सिंह आदि क्रांतिकारियों ने की | उस समय गाँधी जी की लीडरशिप में कांग्रेस की मांग डोमिनियन स्टेट की थी | यानि कि शासन तो अंग्रेजों का ही हो पर उसमे थोड़ी बहुत सहभागिता भारतियों की हो | जब अंग्रेजों के अत्याचारों के विरूद्ध भारतियों में आक्रोश बढ़ा और अंग्रेजों की सेफ्टी वाल्व कांग्रेस इस आक्रोश को थामने में असफल रही | तब जाकर 1929 में गाँधी जी द्वारा पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की गयी | तो क्या ये कहा जा सकता है कि गाँधी जी ने सावरकर जी के विचारों को चोरी किया और अपने नाम से उनका प्रचार किया ?

2. सर्वप्रथम 1905 में वीर सावरकर ने विदेश निर्मित वस्त्रों की होली जलाई | सर्वप्रथम उन्होंने भारत के हथकरघा उद्योग की बर्बादी को समझा | बुनकर भाइयों के हक़ की आवाज बने | गाँधी जी ने यही काम ठीक 16 साल बाद 1921 में किया | तब जाकर उन्होंने चरखा चलाया | तब उनका चरखा बुनकरों के संघर्ष का प्रतीक बना |

चरखा चलाने का उद्देश्य बिलकुल स्पष्ट था | अपने हाथ की बुनी खादी पहनों और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करो | उन्होंने खुद एक दुशाला एक धोती पहनी | उनका कहना था की अपनी आवश्यकताओं को कम से कम करों | पर आवश्यकताओं की सीमित रखने का संदेश तो स्वामी विवेकानंद ने उनसे दशकों पहले दिया था | “सिम्पल लिविंग एंड हाई थिंकिंग |” अब चूंकि गाँधी जी ने भी बिलकुल यही सन्देश दिया तो क्या यह कहा जायेगा कि गाँधी जी ने स्वामी विवेकानंद जी की विरासत चुरा ली ?

लेख बहुत लम्बा खिंच चूका है | मैं वापस अपनी प्रस्तावना पर आता हूँ | गाँधी ने अपने लिए चरखा नहीं चलाया | उन्हें भारत के मुख्य आसामी फाइनेंस करते थे | वो चाहते तो आसानी से बढ़िया इंग्लॅण्ड का बुना सूट पहनते और उन्होंने पहना भी | किन्तु गरीब बुनकरों की दुर्दशा देख गाँधी जी ने उनके लिए चरखा उठाया | गाँधी जी का चरखा मुख्यत: अंग्रेजों की उस लूट खसोट वाली औपनिवेशिक नीति के विरुद्ध था जिसके तहत अंगेजों ने भारत को लूट अपना घर भरा | जिसने लाखो बुनकरों से उनके चरखे छीन उन्हें पैसे पैसों का मोहताज कर दिया |

इस चरखे ने लोगों को प्रेरणा दी अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़ा होने के लिए | उनका चरखा आर्थिक आज़ादी के संघर्ष का प्रतीक था | पिछले 120 सालों के इस संघर्ष को गाँधी की तस्वीर को कौड़ियों के मोल बेचने वाले तुषार गाँधी और उन जैसे लोग नहीं समझ सकते | आज ग्रामोद्योग बढ़ रहा है | ग्रामीण अंचल के युवा उद्योगों के लिए लोन देकर मोदी सरकार गाँधी और दीन दयाल के ग्राम स्वराज्य के सपनो को साकार कर रही है |

आज ये लोग जो विरोध में हैं वो इसीलिए बौखलाए नहीं हैं कि मोदी की तस्वीर लग गयी | वो इसीलिए बौखला गए हैं कि जिस विरासत को नोच नोच कर उन्होंने आज तक खाया है वो विरासत अब मोदी की हो रही है | अगर यही हाल रहा तो इन विरासतखोरों के लिए खाने के बांदे पड जायेंगे | पर भारत की माटी का एक सपूत अभी जिन्दा है | वो बापू को युही लुटने नहीं देगा | वो चौकीदार अपने डंडे से आपको युही रोकता रहेगा | आप भी अपना कोसने का कीर्तन जारी रखिये | क्युकि बिल्ली के कोसने से कभी उल्काएं नहीं गिरा करती।

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पेशे से एंड्राइड एप्प डेवलपर अनुज अग्रवाल बचपन से डायरी भरने के शौकीन रहे हैं । यायावर हैं । घुम्मकड़ी कर इधर उधर जा के आज भी कलम पकड़ना सीख रहे हैं ।
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