जाट आरक्षण की आग

स्वराज-स्वराज सुनते सुनते कान पक गए हैं। कोई दिल्ली में स्वराज लाना चाहता है तो कोई बिहार, पंजाब या हरियाणा में। मगर ना तो जनता और शायद ना ही ऐसा बोलने वाले राजनेता जानते हैं कि जिस देश में वो रहते हैं उसमें आज तक पूर्ण स्वराज ही स्थापित नहीं हो पाया है। भारत को कभी पूर्ण आज़ादी मिली ही नहीं, इसे तो बस आज़ादी के नाम पर डोमिनियन स्टेटस मतलब औपनिवेशिक स्तर का झुँझना, कुछ गहरे काँटों वाला, पकड़ा दिया गया। इसकी वजह से जो संविधान बना वो अपूर्ण है, जिसमें आरक्षण जैसी कई कमियाँ हैं।

आज संविधान में निहित जाति व् धर्म आधारित आरक्षण की वजह से सभी भारतीयों को समान अवसर नहीं मिल पाते हैं। तभी समय-समय पर कुछ जाति विशेष अपनी सम्पन्त्ता, शानदार इतिहास और शक्ति के बावजूद आरक्षण की मांग करते रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे। यथा राजस्थान का गुर्जर आंदोलन, गुजरात का पटेल आंदोलन और अब हरियाणा में जाट आंदोलन।

जाट भाईयों की वजह से पूरा हरियाणा बन्द पड़ गया है। जबकि हरियाणा सरकार समेत केंद्र सरकार इनकी आरक्षण की मांग को पहले ही मानकर संवैधानिक रूप दे चुकी थी जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। जाट इतने ही समर्थ हैं तो आरक्षण क्यों मांग रहे हैं और क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट जाकर अपना मुकदमा लड़ अपनी मांग मनवा सकते हैं?

आज महाराज सूरजमल जिन्दा होते तो आरक्षण की मांग करने वाले जाटों को उचित पाठ पढ़ाते।

अभी हाल ही में राजस्थान सरकार ने आरक्षण का कोटा बढ़ाकर 50 से 85 प्रतिशत कर दिया था। अगर ऐसा ही हरियाणा सरकार ने किया तो सबको समान अवसर कहाँ से देंगे और साथ ही ऐसा करना दूसरे राज्यों पर जाटों को आरक्षण देने का दबाव डालेगा। जाटों की मांगे यदि आज मानी गयी तो कल अन्य जातियाँ आरक्षण मांगने या अपना आरक्षण का कोटा बढ़ाने या उतना ही रखने हेतु सडकों पर उतरेंगे।

सोचने वाली बात यह है कि जब केंद्र और हरियाणा में कांग्रेस की सरकारों के समय में जाटों ने पहला आंदोलन किया था वो इतना उग्र नहीं था और उस समय इनके पास ऐसा नेतृत्व भी नहीं था। अबकी बार केन्द्र और हरियाणा में भाजपा सरकारों के समय में जाटों का आंदोलन उग्र रूप धारण कर चुका है। इसके दो धड़े बन चुके हैं – एक वो जो शांति से प्रदर्शन कर मुख्य रूप से बातचीत और मीडिया के लिए सामने बैठे हुए हैं, दूसरा धड़ा वो है जो तोड़फोड़ कर हिंसा पर उतारू है। कैमरे के समक्ष खड़ा जाट आंदोलन के नेतृत्व का दल साफ़ कह रहा है कि “प्रदेश में हो रही हिंसा में जाटों का कोई हाथ नहीं है, हिंसा को प्रशासन ही अपने लोगों से करवाकर जाटों को बदनाम करने पर तुला है।”

ऐसे ब्यान, हरियाणा और दिल्ली को मजबूर करने की योजना तथा पूर्व मुख्यमंत्री की नगरी का इस आंदोलन का केंद्र होना साफ़ तौर पर विपक्ष की इस आंदोलन में नेतृत्व की भूमिका पर शक उतपन्न करता है। विपक्ष में बैठी कांग्रेस और इनैलो पर शक की सूईं इसलिए भी टिकती है क्योंकि जाट आंदोलन रोकने के लिए उनकी तरफ से कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए।

गुजरात के मुकाबले हरियाणा के मामले में एक कमी है। पहले की कांग्रेस सरकारें जाटों की मांगों को मानकर, अब की सरकारों का हमेशा के लिए इस मामले में पक्ष कमजोर कर चुकी हैं।

ऐसे में केंद्र और हरियाणा में बैठी भाजपा सरकार को क्या करना चाहिए? केंद्र सरकार जैसे गुजरात में पटेलों के आंदोलन से निपटी थी वैसे ही भारतीय सेना की समस्त शक्ति के साथ जाटों के आंदोलन से निबटना चाहिए। जो सेना जम्मू-कश्मीर में आतंकियों को रोजाना नाकों चने चबवाती है, क्या वो खुद को प्रशासन के कारण हरियाणा में जाट आंदोलन का सामना करने में बेबस नहीं समझती होगी? प्रशासन की उपेक्षा के कारण क्या वीर सैनिकों की मानसिक स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ेगा?

वर्तमान की केंद्र और हरियाणा की भाजपा सरकारों को चाहिए कि भले ही वो पहले की सरकारों के कारण मांगे मानने को मजबूर हों मगर उन्हें हिंसा पर उतारू जाटों को आंदोलन के दौरान ही अच्छा सबक देना चाहिए कि केंद्र या हरियाणा सरकार की शक्ति का मतलब आखिर होता क्या है? आंदोलन के बाद भी दोषी हिंसकों को कड़ी से कड़ी सजा देते हुए उनको जेल की हवा खिलानी चाहिए। उनको सबक मिलना चाहिए कि सरकारी चीजों का नुकसान करने का क्या नुकसान होता है?

सरकारों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हरियाणा में इस समय वो लोग जो जाट नहीं हैं जिन्हें नॉन-जाट कहा जाता है जैसेकि पंजाबी, बनिया, ठाकुर, यादव, अहीर, ब्राह्मण, सैनी और अन्य जातियों के लोग पूर्णतया खौफ में जी रहे हैं। उनको ना सिर्फ अपनी जान का खतरा है बल्कि उनकी चल-अचल सम्पति जाटों की हिंसा के कारण पहले से ही निशाने पर है।

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