फिल्म घातक और श्रीनगर घटना

फ़िल्म-घातक

कात्या और उसके भाईयों का इलाक़े में ज़बरदस्त आतंक है, हर कोई डरा सहमा सा कात्या और उसके भाईयों के जुल्मों को सहन कर रहा है। तभी काशी का इलाके में आना होता है और पहली बार आतंक मचा रहे गुंडों की पिटाई हो जाती है। दबे कुचले लोगों को काशी में अपना रक्षक दिखाई देता है और इलाके में ख़ुशी की लहर दौड़ पड़ती है। लोगों में उत्साह है और सब लोग एकमत से कात्या के ख़िलाफ़ खड़े हो जाते है।

इस विरोध से तमतमाया कात्या काशी और उसके परिवार पर बेहिसाब अत्याचार करता है, यहाँ तक कि काशी के बाऊजी के गले में पट्टा डालकर कुत्ते की तरह इलाक़े में घुमाता है ताकि लोगों में दहशत कायम रहे। जनता तमाशबीन बनकर ये सब देखती रहती है, क्योंकि वहाँ काशी नहीं है।

काशी के बाऊजी काशी को समझाते हैं कि कात्या को नहीं लोगों के अंदर भरे उसके ‘डर’ को मारो, जिस दिन ये ‘डर’ खत्म हो जायेगा, कात्या अपने आप खत्म हो जायेगा।

काशी एक एक करके कात्या के भाईयों को मारना शुरू करता है। अब दहशत कात्या और उसके भाईयों में फ़ैल जाती है। फिर कात्या काशी को पकड़कर उसी इलाक़े में ले आता है क्योंकि कात्या को अपने पिता का अंतिम संस्कार करना है। उसी तरह से कुत्ता बनाता है जैसा उसके पिता को बनाया था।

आतंकित लोग सब देख रहे हैं, किसी में हिम्मत नहीं कि वो कात्या का विरोध कर सके। तभी भीड़ में से काशी की प्रेमिका आती है और कात्या को ललकारती है, अपने भाईयों के साथ मिलकर एक आदमी को बांधकर क्या मर्द बनता है, लेकिन तू देख ये उठेगा और तुझे कुत्ता बनाएगा।

तभी काशी का 6-7 साल भतीजा कात्या को पत्थर उठाकर मार देता है ये देखकर काशी भी अपनी पूरी ताक़त लगाकर अपने आपको छुड़ाता है और कात्या के गले में पट्टा डालकर उसे कुत्ता बना देता है कुत्ते की मौत भी देता है।

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2014 के पहले तक तमाशबीन बनी जनता भी एक काशी के आने के बाद से उत्साह में हैं। जगह जगह से बरसों से छिपे बैठे कात्या और उसके साथी बाहर निकल निकलकर आ रहे हैं। चाहे वो विपक्ष हों, मीडिया हों, यूनिवर्सटीस हों, बुद्धिजीवी हों ये सब कात्या और उसके साथी ही हैं। तमाशबीन जनता ये चाहती है कि मोदी इन सबका अंत तुरंत कर दे वर्ना वो फिर कात्या और उसके साथियों का आतंक सहने को तैयार है। उनको काशी पर होने वाले जुल्मों से कोई मतलब नहीं बस किसी कात्या ने अगर उन पर कुछ जुल्म किया तो वो बजाय काशी के कात्या के साथ खड़े हो जाना चाहते हैं। जनता चाहती है, अब काशी आ गया है तो किसी पर भी, कहीं पर भी ज़ुल्म नहीं होना चाहिए। हमारा कुछ न बिगड़े हमें कुछ भी न हों वर्ना काशी की खैर नहीं।

बरसों से दबे कुचले लोगों की आवाज़ अब उठने लगी है तो उसका कारण केंद्र में बैठा वो सफ़ेद दाढ़ी मूँछ वाला काशी ही है। उसी के कारण आपमें, हममें हिम्मत आई है। अब तय हमें करना है कि हर हाल में काशी का साथ देना है या कात्या के ज़ुल्मों को फिर से सहन करना है।

काशी के होते हुए भी अगर थोडा बहुत भी ज़ुल्म सहन नहीं कर सकते तो बेशक कात्या के साथ खड़े हो जाओ क्योंकि कात्या के राज़ में आवाज़ नहीं उठा पाओगे, वो तुम्हारे गले में पट्टा डालकर तुम्हें कुत्ता बनाएगा और तुम चाहकर भी कुछ नहीं कर पाओगे।

काशी की प्रेमिका जैसा विश्वास और उसके भतीजे जैसा साहस अगर तुममें नहीं है तो फिर, गले में पट्टा डालकर घूमना ही तुम्हारी नियति है….

#श्रीनगर_घटना

हर्षल खैरनार
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