संसद का इतिहास

राज दो ही कर सकते हैं – राजा या संसद| संसद का विरोध करने वालों, सबसे पुरानी संसद की स्थापना किसने करी थी और क्यूँ करी थी, पता भी है|पुरातन भारत में हर राजा के पास मंत्रिपरिषद होती थी, जिसका एक मुख्य मंत्री होता था| मंत्रिपरिषद के हर मंत्री के पास राज्य के सभी हिस्सों का कार्यभार होता था| उदहारणतया एक मंत्री के पास पाँच गाँव होते थे तो उन पाँच गांवों के सरपंच अपने में से एक मुख्य सरपंच बनाकर मंत्री के निर्देश में कार्य करते थे| मंत्री अपने ऊपर मुख्यमंत्री को सूचित करता था तथा मुख्यमंत्री राजा से बातचीत करता था| गांवों की संख्या अधिक होने से उपमंत्री भी बनाये जाते थे|

यह राज करने की पद्धति भारत में पुरातन काल से लेकर अभी तक चलती आ रही है| फर्क सिर्फ इतना है कि आज जनता विभिन्न पार्टियों को चुन सकती है, राजा के बजे पार्टी चुनती है कि मंत्रिपरिषद में कौन कौन होगा|
इस पद्धति का अपवाद तब उत्पन्न हुआ जब महाराजा ययाति को शुक्राचार्य ने श्राप दिया कि तुम अपनी जवानी खोकर बूढ़े हो जाओगे क्यूंकि ययाति ने पहले तो देवयानी फिर गुरुपुत्री शर्मिष्ठा से विवाह कर लिया था तथा फिर अन्य विवाह भी किये थे| क्षमायाचना करने पर शुक्राचार्य ने कहा कि तुम अपने किसी एक पुत्र कि जवानी ले सकते हो| तब ययाति ने अपने पुत्रों – यदु, तुर्वसु, अनु, द्रुहू, और पुरु से बारी-बारी पूछा| पुरु सबसे छोटे थे उन्होंने बाकि बड़े भाइयों के मना करने पर अपना यौवन महाराजा ययाति को दे दिया| पुनः युवा होने पर ययाति ने पुरु को सम्राट बना दिया और अन्य पुत्रों को कभी भी राजा ना बनने का श्राप दे दिया| क्षमायाचना करने पर ययाति ने यदु, तुर्वसु, अनु, और द्रुहू को मंडलाधीशबना दिया एवं कहा कि जैसे जैसे तुम्हारी संतानें तुम्हारे अपने मूल वंश से निकलती जायेंगी राज्य करने योग्य बनती जाएँगी|
मंडलाधीश प्रधानमंत्री की तरह होते हैं जो विभिन्न मंडलों पर शासन करते हैं परन्तु मंडलों से सम्मिलित राज्य पर एक केंद्रीकृत राजा का राज्य होता है, जैसे यदु, तुर्वसु, अनु, और द्रुहू के मंडलों पर महाराजा पुरु का शासन होता था| जैसे जैसे यदु आदि भाइयों से उनकी संतानों के वंश अलग होते गए तो वह वंश राज्य करने लगे|
यदुओं यानी यादवों ने सबसे पहले लोकतंत्र की स्थापना की तथा एक राजा के ना होते हुए भी स्वतंत्र रूप से अपना राज्य चलाया| मथुरा, गुजरात तथा अन्य भागों में उनका शासन होता था| श्रीकृषण इसी यदुवंश में जन्मे थे| इन्होने लाभ की दृष्टि से सरस्वती नदी तथा समुन्द्र के संगम स्थान पर गुजरात में द्वारका की स्थापना की जिससे प्रमुख घाटों में मथुरा के साथ बंदरगाह पर यादवों का राज लोकतंत्र से चल रहा था|
नवीन काल में छत्रपति  शिवाजी ने  पुनः मंत्रिपरिषद को व्यापक अधिकार तथा महत्व प्रदान किये| उन्होंने स्वयं सेना अपनी मंत्रिपरिषद के अध्यक्ष – पेशवा को दे दी थी| राज्य की व्यवस्था पेशवा देखते थे परन्तु अंतिम निर्णय एवं फैसला छत्रपति शिवाजी का होता था|
अतःव संसद ख़त्म करोगे तो राज्य कौन करेगा – राजा| तो एक छत्रपति राजा के निचे सबको जीना पड़ेगा| राजा के समय आपके पास वोट करने का भी अधिकार नहीं होगा|

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